क्या भारत तेज विकास और कम महंगाई के संतुलित दौर में तटस्थ नीति अपनाए?
सारांश
Key Takeaways
- भारत इस समय तेज विकास और कम महंगाई के संतुलित दौर में है।
- नीतियों को संतुलित यानी तटस्थ रखना आवश्यक है।
- सरकारी खर्च पर नियंत्रण और आसान ब्याज दरें जरूरी हैं।
- अर्थव्यवस्था में अंदरूनी कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए।
- राज्यों के कर्ज बढ़ने की संभावना है, लेकिन वित्तीय अनुशासन आवश्यक है।
नई दिल्ली, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्तमान में भारत तेज आर्थिक विकास और कम महंगाई के एक संतुलित दौर में है, जिसे अर्थशास्त्री 'गोल्डीलॉक्स फेज' के नाम से जानते हैं। मंगलवार को जारी हुई एचएसबीसी की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि नीतियों को न तो अत्यधिक कड़ा और न ही बहुत लचीला रखना चाहिए, बल्कि एक संतुलित यानी लगभग तटस्थ नीति अपनाई जानी चाहिए।
एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 में बाजार और समग्र अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए ऐसी नीति सबसे प्रभावी होगी, जिसमें सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखा जाए और ब्याज दरें सुगम बनी रहें।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि सरकार खर्च में सावधानीसंतुलन प्राप्त होगा और सभी प्रकार के निवेश को लाभ मिलेगा।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अर्थव्यवस्था में कुछ अंदरूनी कमजोरियां अभी भी विद्यमान हैं, जिनमें कंपनियों द्वारा कम निवेश और विदेशों से पूंजी का कम आना शामिल है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बॉन्ड मार्केट्स ने 2026 की शुरुआत में राज्यों द्वारा अधिक कर्ज लेने की संभावना को पहले ही ध्यान में रखा है। इसके साथ ही, आरबीआई द्वारा बॉंड खरीद, बजट में वित्तीय अनुशासन और भारत को ग्लोबल बॉंड इंडेक्स में शामिल करने से विदेशी निवेश आने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के आर्थिक सुधारों, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि और शेयरों के उचित दामों के कारण शेयर बाजार को लाभ हो सकता है। लेकिन लंबे समय तक लाभ प्राप्त करने के लिए कंपनियों के निवेश और विदेशी निवेश को बढ़ाने वाले बड़े सुधार जरूरी हैं।
एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा कि उनके रिसर्च फर्म के अनुमान के अनुसार, अगले वर्ष महंगाई दर चार प्रतिशत से थोड़ी कम रहेगी, जिससे आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव नहीं रहेगा। यदि विकास की गति धीमी होती है, तो ब्याज दरें और कम करने की गुंजाइश भी रहेगी।
उन्होंने यह भी बताया कि यदि विकास दर कमजोर पड़ती है, तो और राहत दी जा सकती है, जो बाजार की मौजूदा सोच से विपरीत है, जहां लोग सख्त मौद्रिक नीति और लचीली वित्तीय नीति की उम्मीद कर रहे हैं।
प्रांजुल भंडारी ने बताया कि विश्वभर में कई घटनाएं चल रही हैं, जैसे टैरिफ से संबंधित खबरें, ग्लोबल बॉंड इंडेक्स में शामिल होने की प्रक्रिया और विकसित देशों में ब्याज दरों का बढ़ना, जो भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2031 तक सार्वजनिक कर्ज को महामारी से पहले के स्तर तक लाया जाए। इसके लिए अगले पांच वर्षों तक लगातार वित्तीय सुधार और खर्च पर नियंत्रण आवश्यक होगा।
केंद्र सरकार द्वारा किया गया यह वित्तीय संतुलन निजीकरण के जरिए पूरा किया जा सकता है, जिससे आर्थिक विकास पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई राज्यों में सार्वजनिक कर्ज बढ़ने की संभावना है, लेकिन 3 प्रतिशत की वित्तीय घाटे की सीमा के कारण घाटे को नियंत्रित रखा जाएगा।