खाड़ी संघर्ष: यदि यह लंबा चला तो महंगाई में हो सकता है इजाफा, भारत पर सीमित प्रभाव: एसबीआई रिपोर्ट
सारांश
Key Takeaways
- खाड़ी क्षेत्र का संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।
- महंगाई में वृद्धि और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता की संभावना है।
- आरबीआई के कदमों से भारत के घरेलू बाजार को समर्थन मिला है।
- तेल की कीमतों में वृद्धि से जीडीपी वृद्धि पर प्रभाव पड़ेगा।
- संघर्ष से कुछ देशों को लाभ भी हो सकता है।
नई दिल्ली, 7 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्ष, जिसमें इजरायल, ईरान और अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकाने शामिल हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण असर डाल सकते हैं। शनिवार को जारी एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो इससे वैश्विक मंदी का दबाव, महंगाई और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत के घरेलू वित्तीय बाजारों को वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के समर्थन से स्थिरता मिली हुई है। आरबीआई ने सरकारी बॉंड (जी-सेक) की यील्ड को संतुलित रखने और रुपए की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि यह संघर्ष जारी रहता है, तो इससे भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक संकेतकों पर भी दबाव आ सकता है।
आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करके रुपए की अस्थिरता को कम करने में सफलता पाई है और इसे 92 के स्तर से नीचे बनाए रखा है। वर्तमान अनिश्चितता के बीच, यह कदम काफी महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव डाल रहा है, क्योंकि लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है। इस कारण तेल की कीमतें बढ़ रही हैं।
फिलहाल, ब्रेंट क्रूड की कीमत 91.84 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई 89.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है।
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 10 डॉलर बढ़ती है, तो वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा (सीएडी) लगभग 36 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6 प्रतिशत तक आ सकती है।
एसबीआई रिसर्च ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इस संघर्ष का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह युद्ध कोंड्राटिएफ वेव के अंतिम चरण में हो रहा है, जो लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक चक्र का सिद्धांत है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संरचनात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
इस संघर्ष में कुछ देशों को लाभ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका को तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से फायदा हो सकता है। साथ ही, यूरोप की रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम होने से अमेरिका के लिए नए अवसर उत्पन्न हो सकते हैं।
हालांकि, दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच, कई केंद्रीय बैंक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 17.6 प्रतिशत हिस्सा सोने का है।
अंततः, इस संघर्ष का असर भारत पर कई तरीकों से पड़ सकता है, जैसे कि खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस, कच्चे तेल का आयात और पश्चिम एशियाई देशों के साथ व्यापार।
हालांकि, रूसी कच्चे तेल की खरीद और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स जैसे कदमों के कारण आपूर्ति से जुड़े जोखिम कुछ हद तक कम हो सकते हैं।
रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता तेल की कीमतों, महंगाई की उम्मीदों और निवेशकों के भरोसे को प्रभावित करती रहेगी। इसलिए, नीति निर्माताओं और निवेशकों को इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखने की आवश्यकता है।