15 जुलाई 2026
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मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को ₹62,500 करोड़ की मंजूरी, 2031 तक 60,000 नौकरियों का लक्ष्य

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मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को ₹62,500 करोड़ की मंजूरी, 2031 तक 60,000 नौकरियों का लक्ष्य

सारांश

केंद्रीय कैबिनेट ने ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को हरी झंडी दी — यह पुरानी PLI स्कीम की जगह लेगी और 2031 तक ₹39 लाख करोड़ का उत्पादन व 60,000 सीधी नौकरियाँ पैदा करने का लक्ष्य रखती है। भारत पहले से ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता है।

मुख्य बातें

केंद्रीय कैबिनेट ने 15 जुलाई 2026 को मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) को ₹62,500 करोड़ के बजट के साथ मंजूरी दी।
स्कीम वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पाँच वर्षों के लिए लागू रहेगी।
निर्माताओं को योग्य बिक्री पर 2.25% से 5% इंसेंटिव; घरेलू सोर्सिंग पर 1.5% और R&D पर 3% अतिरिक्त इंसेंटिव।
स्कीम की अवधि में ₹39 लाख करोड़ का उत्पादन और लगभग 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ पैदा होने का अनुमान।
यह स्कीम 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई पुरानी PLI इलेक्ट्रॉनिक्स स्कीम की जगह लेगी।
भारत वर्तमान में वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है और 99.2% मोबाइल फोन घरेलू स्तर पर बनते हैं।

केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार, 15 जुलाई 2026 को मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) को ₹62,500 करोड़ के बजट के साथ औपचारिक मंजूरी दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी की बैठक में लिए गए इस फैसले का उद्देश्य भारत के घरेलू मोबाइल उत्पादन और निर्यात को नई ऊँचाई पर ले जाना और देश को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में और मजबूती से स्थापित करना है।

स्कीम की मुख्य संरचना

MPMS वित्त वर्ष 2026-27 से वित्त वर्ष 2030-31 तक यानी पाँच वर्षों के लिए लागू रहेगी। इस दौरान निर्माताओं को भारत में बने मोबाइल फोन की योग्य बिक्री पर 2.25% से 5% तक की दर से इंसेंटिव सपोर्ट मिलेगा। इसके अतिरिक्त, मुख्य पुर्जों और सब-असेंबली की घरेलू सोर्सिंग पर 1.5% तक का अतिरिक्त इंसेंटिव भी देय होगा।

घरेलू ब्रांडों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रावधान के तहत, प्रोडक्ट डिज़ाइन और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश करने वाले निर्माता योग्य बिक्री पर 3% का अतिरिक्त इंसेंटिव पाने के हकदार होंगे। यह प्रावधान स्कीम को पिछले PLI ढाँचे से अलग करता है, जो मुख्यतः उत्पादन मात्रा पर केंद्रित था।

उत्पादन और रोज़गार का अनुमान

कैबिनेट के आकलन के अनुसार, स्कीम की अवधि के दौरान देश में कुल ₹39 लाख करोड़ मूल्य का मोबाइल फोन उत्पादन होने की उम्मीद है। इसके साथ ही हैंडसेट निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि अपेक्षित है। रोज़गार के मोर्चे पर, MPMS से लगभग 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ सृजित होने का अनुमान लगाया गया है।

भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में मौजूदा स्थिति

यह स्कीम ऐसे समय में आई है जब भारत वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है। देश में उपयोग होने वाले 99.2% मोबाइल फोन अब घरेलू स्तर पर ही निर्मित होते हैं। गौरतलब है कि 2025 में स्मार्टफोन भारत की सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी बनकर उभरे, जिन्होंने डीजल ईंधन और कटे हुए हीरों जैसी पारंपरिक निर्यात श्रेणियों को पीछे छोड़ दिया।

सरकार के अनुसार, 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के तहत वित्त वर्ष 2014-15 के बाद से इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में सात गुना और निर्यात में 11 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

पुरानी PLI स्कीम की जगह लेगी MPMS

MPMS उस 'बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव स्कीम' का स्थान लेगी, जिसका कार्यकाल 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गया था। सरकार का कहना है कि पूर्ववर्ती PLI स्कीम ने भारत को मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

आगे की राह

नई स्कीम की रूपरेखा में आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना और डिज़ाइन व R&D में निवेश के माध्यम से भारतीय मोबाइल ब्रांडों को आगे बढ़ाना शामिल है। उद्योग जगत अब विस्तृत क्रियान्वयन दिशानिर्देशों का इंतज़ार कर रहा है, जिनसे यह स्पष्ट होगा कि इंसेंटिव वितरण की प्रक्रिया किस प्रकार सत्यापन-योग्य उत्पादन और रोज़गार लक्ष्यों से जुड़ी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

500 करोड़ की यह स्कीम संख्या में प्रभावशाली है, लेकिन असली कसौटी इंसेंटिव और सत्यापन-योग्य रोज़गार परिणामों के बीच की कड़ी होगी — जो पूर्ववर्ती PLI स्कीम की सबसे बड़ी कमज़ोरी रही। R&D और डिज़ाइन पर 3% अतिरिक्त इंसेंटिव का प्रावधान सही दिशा में है, लेकिन भारत के मोबाइल निर्यात में अब भी विदेशी ब्रांडों की असेंबली का वर्चस्व है, न कि स्वदेशी डिज़ाइन का। 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियों का लक्ष्य ₹39 लाख करोड़ के उत्पादन अनुमान की तुलना में काफी कम है, जो यह सवाल उठाता है कि क्या यह स्कीम श्रम-गहन विनिर्माण को पर्याप्त प्रोत्साहन देती है। क्रियान्वयन दिशानिर्देश यह तय करेंगे कि यह महत्वाकांक्षा हकीकत बनती है या महज एक और नीतिगत घोषणा।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) क्या है?
MPMS केंद्र सरकार की एक नई पाँच वर्षीय योजना है, जिसे 15 जुलाई 2026 को ₹62,500 करोड़ के बजट के साथ मंजूरी दी गई है। इसका उद्देश्य भारत में मोबाइल फोन के घरेलू उत्पादन, निर्यात और R&D को बढ़ावा देना है।
MPMS के तहत निर्माताओं को कितना इंसेंटिव मिलेगा?
निर्माताओं को भारत में बने मोबाइल फोन की योग्य बिक्री पर 2.25% से 5% तक इंसेंटिव मिलेगा। इसके अलावा घरेलू सोर्सिंग पर 1.5% और प्रोडक्ट डिज़ाइन व R&D पर 3% का अतिरिक्त इंसेंटिव भी देय होगा।
MPMS से कितनी नौकरियाँ पैदा होंगी?
सरकारी अनुमान के अनुसार MPMS से स्कीम की अवधि के दौरान लगभग 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ सृजित होने की उम्मीद है। इसके साथ ही ₹39 लाख करोड़ का कुल मोबाइल फोन उत्पादन भी अपेक्षित है।
MPMS किस पुरानी स्कीम की जगह लेगी?
MPMS उस 'बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव स्कीम' की जगह लेगी, जिसका कार्यकाल 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गया था। सरकार का कहना है कि पुरानी PLI स्कीम ने भारत को मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में अभी क्या स्थिति है?
भारत वर्तमान में वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है और देश में उपयोग होने वाले 99.2% मोबाइल फोन घरेलू स्तर पर बनते हैं। 2025 में स्मार्टफोन भारत की सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी बन गए, जिन्होंने डीजल ईंधन और कटे हुए हीरों को पीछे छोड़ दिया।
राष्ट्र प्रेस
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