खाद्यान्न उत्पादन 376.56 मिलियन टन रहने का अनुमान, विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना से मिल रहा बल
सारांश
मुख्य बातें
वित्त वर्ष 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.563 मिलियन टन रहने का अनुमान है — जो पिछले वर्ष के 357.732 मिलियन टन की तुलना में 18.8 मिलियन टन यानी 5.3 प्रतिशत अधिक है। यह आँकड़ा 3 सितंबर 2026 को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट में सामने आया। इसके साथ ही, सहकारी क्षेत्र में विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण ढाँचे के विस्तार ने इस उत्पादन वृद्धि को ज़मीन पर टिकाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।
उत्पादन में उछाल का महत्व
भारत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों में से एक संचालित करता है, जिसके दायरे में करीब 80 करोड़ लोग आते हैं। ऐसे में खाद्यान्न उत्पादन में यह वृद्धि केवल कृषि आँकड़ा नहीं है — यह सामाजिक सुरक्षा की नींव को और मज़बूत करने वाला संकेत भी है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना हुआ है।
विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना की भूमिका
फैक्टशीट के अनुसार, 2023 में सहकारी क्षेत्र में शुरू की गई विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना ने प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के माध्यम से भंडारण, प्रसंस्करण, खरीद और वितरण प्रणालियों को बेहतर बनाने में मदद की है। इस योजना को संस्थागत समन्वय और वित्तीय सहायता तंत्र के माध्यम से सहारा दिया जा रहा है।
11 राज्यों में 9,750 मिलियन टन भंडारण क्षमता के साथ शुरू हुई पायलट परियोजनाएँ लगातार विस्तार कर रही हैं। जुलाई 2026 तक देशभर में 313 PACS में गोदामों का निर्माण पूरा हो चुका था, जिससे 1.80 लाख टन (LMT) से अधिक की भंडारण क्षमता तैयार हुई है।
योजना के प्रमुख उद्देश्य
इस योजना के तहत कई लक्ष्य एक साथ साधे जा रहे हैं — खाद्यान्न की बर्बादी कम करना, किसानों को संकट में बिक्री से बचाना और बेहतर मूल्य दिलाना, खरीद केंद्रों व उचित मूल्य दुकानों के बीच परिवहन लागत घटाना, और PACS की भूमिका को कृषि गतिविधियों में विविधता लाकर विस्तारित करना। साथ ही, यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी सृजित करती है।
पायलट राज्य और परिचालन आधार
पायलट परियोजनाएँ महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, असम, कर्नाटक और त्रिपुरा में लागू की गई हैं। फैक्टशीट के अनुसार, इन परियोजनाओं ने सहकारी स्तर पर स्थानीय भंडारण ढाँचे की व्यवहार्यता को प्रमाणित किया है और महत्वपूर्ण परिचालन आधार तैयार किया है। इस ढाँचे में गुणवत्ता मानकों, पारदर्शिता और संचालन की व्यवहार्यता पर भी जोर दिया गया है।
आगे की राह
उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि और भंडारण क्षमता के विस्तार के बीच यह देखना होगा कि PACS नेटवर्क का राष्ट्रव्यापी विस्तार कितनी तेज़ी से होता है और किसानों तक इसका वास्तविक लाभ पहुँचता है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि विकेंद्रीकृत भंडारण ढाँचे की सफलता अंततः स्थानीय प्रशासन और सहकारी संस्थाओं की क्षमता पर निर्भर करेगी।