भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्रांति: REER में 16% गिरावट और ₹12.2 लाख करोड़ के कैपेक्स से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की नई राह
सारांश
मुख्य बातें
भारत अब केवल कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र नहीं रहा — कार्नेलियन एसेट मैनेजमेंट एंड एडवाइजर्स की 13 जुलाई 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, देश उच्च-मूल्य वाले वैश्विक विनिर्माण में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता तेज़ी से विकसित कर रहा है। रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) में दिसंबर 2024 से अप्रैल 2026 के बीच लगभग 16 प्रतिशत की गिरावट, बेहतर व्यापार पहुँच और केंद्रीय बजट में ₹12.2 लाख करोड़ के रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय ने मिलकर इस संरचनात्मक बदलाव को नई गति दी है।
मैन्युफैक्चरिंग 2.0: संरचनात्मक बदलाव के संकेत
रिपोर्ट में कहा गया है कि 'मैन्युफैक्चरिंग 2.0' अब केवल नीतिगत दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने लगा है। विकास का अगला चरण कई कारकों के एक साथ सक्रिय होने से आगे बढ़ेगा — जिनमें मुद्रा प्रतिस्पर्धात्मकता, व्यापार समझौते और सरकारी निवेश प्रमुख हैं। फर्म के अनुसार, उसके भारत के पहले मैन्युफैक्चरिंग-केंद्रित फंड ने 2020 में शुरुआत के बाद से 32 प्रतिशत से अधिक CAGR (कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट) दिया है।
REER गिरावट और निर्यात का ऐतिहासिक संबंध
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पैटर्न उजागर किया गया है — पिछले तीन दशकों में जब भी भारतीय REER में बड़ी गिरावट आई है, निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है। दिसंबर 2024 से अप्रैल 2026 के बीच आई 16 प्रतिशत की गिरावट 1990 के दशक की शुरुआत के बाद से सबसे बड़ी लगातार गिरावट है, जो निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एक दुर्लभ अवसर बनाती है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत की व्यापार पहुँच ने वैश्विक आयात के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर के बाज़ार तक विशेष पहुँच सुनिश्चित की है।
प्रमुख क्षेत्र और उभरते अवसर
फर्म ने पाँच क्षेत्रों में सबसे बड़े अवसर चिह्नित किए हैं: इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज़, डिफेंस एक्सपोर्ट, फार्मा और CDMO एक्सपोर्ट, ऑटो एंसिलरी, तथा टेक्सटाइल व कपड़े। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत की प्रगति विशेष रूप से उल्लेखनीय है — देश का मोबाइल फोन उत्पादन लगभग 56 अरब डॉलर को पार कर चुका है और Apple अब अपने वैश्विक iPhone उत्पादन का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत में असेंबल करता है। iPhone का निर्यात अकेले 17 अरब डॉलर से अधिक पहुँच चुका है।
सरकारी पूंजी व्यय: एक दशक में चार गुना उछाल
केंद्रीय बजट 2026-27 में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर ₹12.2 लाख करोड़ किया गया है, जो एक दशक पहले की तुलना में चार गुना अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की अनुकूल नीतियाँ, वैश्विक सप्लाई-चेन में विविधता, घरेलू माँग में वृद्धि और बेहतर बुनियादी ढाँचा मिलकर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एक मज़बूत तेज़ी का दौर बना रहे हैं। फर्म के शब्दों में, 'धन सृजन के सबसे बड़े अवसर अकसर तब सामने आते हैं जब बाज़ार संरचनात्मक बदलावों को पूरी तरह नहीं समझ पाता।'
आगे की राह
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत औद्योगिक विस्तार के कई वर्षों तक चलने वाले दौर में प्रवेश कर रहा है, जिसमें निवेश के बड़े अवसर उभर रहे हैं। गौरतलब है कि यह अनुमान उस व्यापक वैश्विक संदर्भ में आया है जहाँ चीन-केंद्रित सप्लाई चेन से विविधीकरण की माँग तेज़ हो रही है और भारत एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर रहा है।