13 जुलाई 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के गोहत्या प्रतिबंध आदेश पर रोक लगाई, तमिलनाडु सरकार को राहत

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सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के गोहत्या प्रतिबंध आदेश पर रोक लगाई, तमिलनाडु सरकार को राहत

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश देने वाले मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने नोटिस जारी किया; राज्य सरकार का तर्क — 1958 का कानून पूर्ण प्रतिबंध की इजाजत नहीं देता।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 जुलाई 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय के गोहत्या प्रतिबंध आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।
हाईकोर्ट ने 27 मई को 1976 के सरकारी आदेश के आधार पर तमिलनाडु में राज्यव्यापी गोहत्या प्रतिबंध लागू करने का निर्देश दिया था।
तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के तहत 10 वर्ष से अधिक आयु की अनुपयोगी गायों के वध की अनुमति है — राज्य सरकार ने इसी आधार पर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी।
वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम.
सिंघवी और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांतो सेन ने तमिलनाडु सरकार का पक्ष रखा।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 13 जुलाई 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय के उस विवादित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु में गोहत्या पर राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध को तत्काल प्रभाव से लागू करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने मामले में नोटिस जारी करते हुए यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से पहले उसमें सुधार की आवश्यकता थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मद्रास उच्च न्यायालय ने 27 मई को 1976 के सरकारी आदेश का हवाला देते हुए तमिलनाडु में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को आदेश दिया था कि बकरीद के अवसर पर या किसी भी अन्य दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े की हत्या न होने दी जाए। यह आदेश कोयंबटूर निवासी के. सूर्या की जनहित याचिका पर आया था, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर गोवध रोकने की माँग की गई थी।

तमिलनाडु सरकार का पक्ष

तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांतो सेन ने पैरवी की। राज्य सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट ने यह आदेश देते हुए अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया।

सरकार ने अपनी याचिका में तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून के तहत 10 वर्ष से अधिक आयु की उन गायों का वध किया जा सकता है जो न तो काम करने योग्य हैं और न ही प्रजनन के लिए उपयुक्त हैं। सरकार का यह भी कहना है कि राज्य में पशु वध को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनों में कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से पूर्व उसमें कुछ संशोधन की दरकार थी। कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और मामले की आगे की सुनवाई निर्धारित की है। फिलहाल हाईकोर्ट का राज्यव्यापी प्रतिबंध का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।

कानूनी और सामाजिक निहितार्थ

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब धार्मिक त्योहारों के आसपास पशु वध से जुड़े कानूनी विवाद देशभर में संवेदनशील मुद्दा बने हुए हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु उन राज्यों में से है जहाँ पशु वध पर आंशिक नियंत्रण है, न कि पूर्ण प्रतिबंध — और हाईकोर्ट का आदेश इसी स्थापित कानूनी ढाँचे को चुनौती दे रहा था। राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर मौजूदा कानूनी स्थिति बहाल करने का अनुरोध किया है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई तक हाईकोर्ट का आदेश निलंबित रहेगा। यह फैसला तमिलनाडु में पशु वध कानूनों की व्याख्या और राज्य विधायिका बनाम न्यायिक निर्देश की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के किस आदेश पर रोक लगाई है?
सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाई है जिसमें 1976 के सरकारी आदेश के आधार पर तमिलनाडु में गोहत्या पर राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध तत्काल लागू करने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश 27 मई को कोयंबटूर निवासी के. सूर्या की जनहित याचिका पर आया था।
तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को क्यों चुनौती दी?
तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट का आदेश तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के विरुद्ध है, जो 10 वर्ष से अधिक आयु की अनुपयोगी गायों के वध की अनुमति देता है। सरकार ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने यह आदेश देते हुए अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की पैरवी किसने की?
वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांतो सेन ने सर्वोच्च न्यायालय में तमिलनाडु सरकार का पक्ष रखा।
तमिलनाडु में गोहत्या को लेकर मौजूदा कानून क्या कहता है?
तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के अनुसार 10 वर्ष से अधिक आयु की उन गायों का वध किया जा सकता है जो काम करने या प्रजनन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। राज्य में पशु वध को नियंत्रित करने वाले अन्य कानून भी हैं, लेकिन किसी में भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है।
इस मामले में अब आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करना होगा। अगली सुनवाई तक मद्रास हाईकोर्ट का गोहत्या प्रतिबंध आदेश निलंबित रहेगा और तमिलनाडु में 1958 के कानून के तहत यथास्थिति बनी रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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