मद्रास हाईकोर्ट की सलाह के बाद तमिलनाडु में ताड़ी प्रतिबंध हटाने की माँग तेज़
सारांश
मुख्य बातें
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु सरकार को ताड़ी (टोडी) उत्पादन और विपणन को प्रोत्साहित करने के उपायों पर गंभीरता से विचार करने की सलाह दी है, जिसके बाद राज्य में 1 जनवरी 1987 से लागू लगभग चार दशक पुराने ताड़ी प्रतिबंध को हटाने की माँग एक बार फिर केंद्र में आ गई है। तेनकासी जिले में एक ताड़ी निकालने वाले व्यक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय की यह टिप्पणी सामने आई, जिसने किसानों, श्रमिक संगठनों और कृषि विशेषज्ञों को नई उम्मीद दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति बी. पुगालेंधी की अध्यक्षता वाली पीठ ने तेनकासी के एक ताड़ी उत्पादक से संबंधित प्रकरण की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को सुझाव दिया कि ताड़ी निकालने को प्रोत्साहित किया जाए और इसके पोषण संबंधी तथा अन्य लाभकारी गुणों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। गौरतलब है कि यह प्रतिबंध मिलावट की आशंका को देखते हुए लगाया गया था और तब से अब तक लागू है।
यह ऐसे समय में आया है जब पड़ोसी राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में लाइसेंस प्राप्त दुकानों के माध्यम से ताड़ी की बिक्री की अनुमति है और वहाँ यह उद्योग फल-फूल रहा है।
हितधारकों की माँग
तमिलनाडु टोडी मूवमेंट के समन्वयक सी. नल्लासामी ने हाईकोर्ट की टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा कि उनका संगठन लंबे समय से इस प्रतिबंध को हटाने की माँग करता आ रहा है। उनके अनुसार, 'ताड़ी केवल मादक पेय नहीं, बल्कि पारंपरिक खाद्य उत्पाद है और सरकार को पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर नीति अपनानी चाहिए।'
नल्लासामी ने यह भी कहा कि प्रतिबंध हटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलेगा और ताड़ तथा नारियल आधारित व्यवसायों पर निर्भर हज़ारों परिवारों की आजीविका मज़बूत होगी।
विशेषज्ञों का मत
कृषि अर्थशास्त्री ए.पी. पलानीचामी ने कहा कि ताड़ी पीढ़ियों से ग्रामीण खाद्य संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है और प्राकृतिक किण्वन के कारण इसमें अल्कोहल की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। उन्होंने बताया कि केरल और आंध्र प्रदेश में ताड़ी की नियंत्रित बिक्री से सरकार को अच्छा राजस्व प्राप्त होता है और वहाँ फ्लेवर्ड तथा वैल्यू-एडेड ताड़ी उत्पाद भी विकसित किए गए हैं।
नल्लासामी ने पर्यावरणीय पक्ष पर ज़ोर देते हुए कहा कि ताड़ (पालमायरा) के पेड़ पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं — इन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, ये विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में आसानी से विकसित होते हैं और कई पारंपरिक उद्योगों की नींव हैं।
आम जनता और किसानों पर असर
किसानों, ताड़ी निकालने वाले श्रमिकों और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संगठनों का तर्क है कि यदि ताड़ी उत्पादन को उचित नियमन के साथ अनुमति दी जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी, रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे और राज्य में बड़ी संख्या में मौजूद पालमायरा पेड़ों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।
आगे की राह
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद विभिन्न हितधारकों ने तमिलनाडु सरकार से माँग की है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ संतुलन बनाते हुए ताड़ी उद्योग को विनियमित तरीके से संचालित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करे। अब सबकी निगाहें राज्य सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं — क्या DMK सरकार इस न्यायिक सुझाव को नीतिगत बदलाव में बदलेगी, यह देखना बाकी है।