तिरुपरनकुंड्रम दीपम विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक से इनकार, तमिलनाडु सरकार को नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 3 अगस्त 2026 को तमिलनाडु सरकार की उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर नोटिस जारी किया, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जो मदुरै के तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित 'दीपा थून' (दीप स्तंभ) पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति देता है। न्यायालय ने राज्य सरकार के एकतरफा स्थगन के आग्रह को स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी पर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर और एक दरगाह दोनों स्थित हैं। विवाद का केंद्र वह पत्थर का स्तंभ है जिसे 'दीपा थून' कहा जाता है और जो दरगाह के निकट है। परंपरागत रूप से कार्तिगई दीपम के अवसर पर इस स्तंभ पर दीया जलाया जाता रहा है।
मद्रास हाईकोर्ट की एकल पीठ — जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में — ने पहले मंदिर प्रशासन को इस स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति दी थी। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने उस एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार से तीखा सवाल किया कि जब हाईकोर्ट का आदेश जनवरी में ही आ गया था, तो राज्य सरकार ने जून तक प्रतीक्षा क्यों की। राज्य सरकार ने 11 जून को यह SLP दाखिल की थी — और उसके कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने पदभार ग्रहण किया।
न्यायालय ने SLP को हिंदू धर्म परिषद की उस लंबित याचिका के साथ जोड़ने का आदेश दिया, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी की देखरेख का दायित्व लेने और विवादित स्थल पर प्रतिदिन दीपक जलाने का आदेश देने की माँग की गई है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ
मद्रास हाईकोर्ट की एकल पीठ ने राज्य सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि दरगाह के पास धार्मिक समारोह से सांप्रदायिक तनाव और कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। एकल पीठ ने अधिकारियों की इन आशंकाओं को महज एक 'काल्पनिक भूत' करार दिया।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर प्रशासन के चुनिंदा प्रतिनिधियों द्वारा प्रतिवर्ष निर्धारित पत्थर के खंभे पर दीपक जलाने से कानून-व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह शांतिपूर्वक धार्मिक आयोजन सुनिश्चित करे, न कि उसमें बाधा डाले। साथ ही, राज्य सरकार को आगाह किया गया कि वह इस प्रकार की आपत्तियों के माध्यम से अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश न करे।
आगे की सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादियों से जवाब माँगा है। मामले को अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा जा चुका है और अगली सुनवाई की तारीख अभी निर्धारित होनी है। फिलहाल मद्रास हाईकोर्ट का आदेश लागू रहेगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है।