23 जुलाई 2026
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मद्रास हाईकोर्ट ने 'वंदे मातरम' सर्कुलर को चुनौती देने की दी अनुमति, नई याचिका दाखिल होगी

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मद्रास हाईकोर्ट ने 'वंदे मातरम' सर्कुलर को चुनौती देने की दी अनुमति, नई याचिका दाखिल होगी

सारांश

मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के 'वंदे मातरम' सर्कुलर को सीधे चुनौती देने की अनुमति दी। यह विवाद तमिलनाडु की 'तमिल थाई वाज़्तु' परंपरा और केंद्र के निर्देश के टकराव से उपजा है — और अब यह केंद्र-राज्य सांस्कृतिक संबंधों का एक बड़ा कानूनी प्रश्न बनने जा रहा है।

मुख्य बातें

मद्रास हाईकोर्ट ने 7 जून 2025 को याचिकाकर्ता को केंद्रीय गृह मंत्रालय के 'वंदे मातरम' सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दी।
चेन्नई निवासी अनन्या राधाकृष्णन ने 10 मई को मुख्यमंत्री विजय के शपथ ग्रहण समारोह के बाद याचिका दाखिल की थी।
याचिकाकर्ता का तर्क: तमिलनाडु में सरकारी कार्यक्रम परंपरागत रूप से 'तमिल थाई वाज़्तु' से शुरू होते रहे हैं, जिसे 1891 में मनोन्मनीयम सुंदरनार ने रचा था।
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी.
अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि सर्कुलर पूरे देश पर लागू है, इसलिए इसकी वैधता को सीधे चुनौती देना आवश्यक है।
पुरानी याचिका वापस ली गई; नई याचिका शीघ्र दाखिल होने की संभावना।

मद्रास हाईकोर्ट ने 7 जून 2025 को याचिकाकर्ता को केंद्रीय गृह मंत्रालय के उस सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए नई याचिका दाखिल करने की अनुमति प्रदान कर दी, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत 'वंदे मातरम' के गायन से करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि सर्कुलर की वैधता को चुनौती दिए बिना इस विषय पर कोई विशेष निर्देश देना न्यायोचित नहीं होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद चेन्नई निवासी अनन्या राधाकृष्णन द्वारा दायर याचिका से उपजा है। याचिका में तमिलनाडु में सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत परंपरागत रूप से 'तमिल थाई वाज़्तु' से किए जाने की व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की मांग की गई थी। यह याचिका 10 मई को तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री विजय और उनकी मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण समारोह के बाद दाखिल की गई थी।

याचिका में उल्लेख किया गया कि उक्त शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत 'वंदे मातरम' और राष्ट्रगान से हुई, जबकि 'तमिल थाई वाज़्तु' का गायन बाद में किया गया — जो राज्य की स्थापित परंपरा के विपरीत था।

याचिकाकर्ता का तर्क

याचिकाकर्ता का कहना था कि तमिलनाडु में दशकों से सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत 'तमिल थाई वाज़्तु' से होती रही है और समापन राष्ट्रगान के साथ किया जाता है। उनके अनुसार इस परंपरा में बदलाव से राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि 'तमिल थाई वाज़्तु', जिसे तमिल विद्वान मनोन्मनीयम सुंदरनार ने 1891 में रचा था, तमिल समाज की सांस्कृतिक विरासत और पहचान का प्रतीक है। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध 'वंदे मातरम' या राष्ट्रगान से नहीं, बल्कि केवल राज्य की परंपरागत व्यवस्था को बहाल रखने की माँग से है।

अदालत की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि गृह मंत्रालय का यह सर्कुलर केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है — यह पूरे देश के राज्यों पर लागू होता है। इसलिए सर्कुलर की वैधता को चुनौती दिए बिना अदालत से राहत माँगना उचित प्रक्रिया नहीं है।

अदालत का निर्णय

खंडपीठ की इस स्पष्ट टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने मौजूदा याचिका वापस लेने और केंद्र सरकार के सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए नई याचिका दाखिल करने की अनुमति माँगी। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी और नई कानूनी कार्यवाही शुरू करने की छूट प्रदान की।

यह मामला केंद्र-राज्य सांस्कृतिक संबंधों और भाषाई पहचान के व्यापक प्रश्न को अदालत के समक्ष ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले हफ्तों में नई याचिका दाखिल होने के बाद इस विषय पर विधिक बहस और तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी जड़ें केंद्र-राज्य सांस्कृतिक संबंधों के उस पुराने तनाव में हैं जो तमिलनाडु में विशेष रूप से संवेदनशील रहा है। गृह मंत्रालय का सर्कुलर राष्ट्रीय स्तर पर लागू है, लेकिन इसका सबसे तीखा विरोध उन राज्यों से आ रहा है जहाँ क्षेत्रीय भाषा और सांस्कृतिक प्रतीक राजनीतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। उल्लेखनीय है कि नई याचिका का दायरा केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा — इसके निहितार्थ उन सभी राज्यों पर पड़ेंगे जहाँ स्थानीय परंपराएँ केंद्रीय निर्देशों से टकराती हैं। अदालत का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकरूपता के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मद्रास हाईकोर्ट में 'वंदे मातरम' सर्कुलर को लेकर क्या मामला है?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी किया था जिसमें सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत 'वंदे मातरम' के गायन से करने का निर्देश था। चेन्नई निवासी अनन्या राधाकृष्णन ने इस निर्देश को तमिलनाडु की 'तमिल थाई वाज़्तु' परंपरा के विरुद्ध बताते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। मद्रास हाईकोर्ट ने अब उन्हें सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दी है।
'तमिल थाई वाज़्तु' क्या है और इसका महत्व क्यों है?
'तमिल थाई वाज़्तु' तमिल विद्वान मनोन्मनीयम सुंदरनार द्वारा 1891 में रचित एक स्तुति-गीत है, जिसे तमिल भाषा और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। तमिलनाडु में परंपरागत रूप से सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत इसी गीत से होती रही है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस परंपरा में बदलाव राज्य की सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करता है।
अदालत ने पुरानी याचिका पर सुनवाई क्यों नहीं की?
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि गृह मंत्रालय का सर्कुलर पूरे देश पर लागू है, केवल तमिलनाडु पर नहीं। इसलिए सर्कुलर की वैधता को सीधे चुनौती दिए बिना अदालत से कोई विशेष निर्देश माँगना प्रक्रियागत रूप से उचित नहीं था।
इस मामले का अगला कदम क्या होगा?
याचिकाकर्ता अब केंद्रीय गृह मंत्रालय के 'वंदे मातरम' सर्कुलर को सीधे चुनौती देते हुए मद्रास हाईकोर्ट में नई याचिका दाखिल करेंगी। नई याचिका में सर्कुलर की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठाया जाएगा, जिसके निहितार्थ तमिलनाडु के साथ-साथ अन्य राज्यों पर भी पड़ सकते हैं।
क्या याचिकाकर्ता 'वंदे मातरम' का विरोध कर रही हैं?
नहीं। याचिकाकर्ता अनन्या राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया है कि उनका विरोध 'वंदे मातरम' या राष्ट्रगान से नहीं है। वे केवल तमिलनाडु की स्थापित परंपरा — यानी सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत 'तमिल थाई वाज़्तु' से करने की व्यवस्था — को बहाल रखने की माँग कर रही हैं।
राष्ट्र प्रेस
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