'तमिल थाई वजथु' दीक्षांत समारोह में पहले गाया जाए: मणिकम टैगोर का अमित शाह से माफी का आग्रह
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी (टीएनसीसी) के अध्यक्ष मणिकम टैगोर ने 26 जुलाई को तिरुनेलवेली स्थित मनोन्मानियम सुंदरनार विश्वविद्यालय के आगामी दीक्षांत समारोह के लिए कथित तौर पर तय किए गए प्रोटोकॉल की कड़ी आलोचना की, यह कहते हुए कि यह तमिलनाडु की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर सीधा प्रहार है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस निर्देश को तत्काल वापस लेने और तमिलनाडु की जनता से सार्वजनिक माफी माँगने की माँग की।
विवाद की जड़: क्या है कथित परिपत्र
यह विवाद 28 जुलाई को होने वाले विश्वविद्यालय के 33वें दीक्षांत समारोह को लेकर उठा है, जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर द्वारा स्नातक छात्रों को डिग्री प्रदान किए जाने की उम्मीद है। टैगोर के अनुसार, विश्वविद्यालय के कुलपति एन. चंद्रशेखर ने मीडिया से बातचीत में बताया कि राज्यपाल कार्यालय ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें निर्देश दिया गया था कि समारोह की शुरुआत वंदे मातरम से हो, उसके बाद राष्ट्रगान गाया जाए, और उसके बाद ही राज्य का आह्वान गीत 'तमिल थाई वजथु' गाया जाए।
गौरतलब है कि 'तमिल थाई वजथु' गीत स्वयं कवि मनोन्मानियम सुंदरनार ने लिखा था — वही विद्वान जिनके नाम पर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। टैगोर ने इसे 'दोहरा अपमान' करार दिया।
टैगोर का तर्क: भाषा और संस्कृति पर हमला
टीएनसीसी प्रमुख ने कहा कि जिस संस्थान का नाम इस गीत के रचयिता के नाम पर रखा गया है, वहाँ उस गीत को तीसरे स्थान पर रखना न केवल तमिल भाषा और संस्कृति का अपमान है, बल्कि राज्य की जनता की भावनाओं को भी ठेस पहुँचाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कथित परिपत्र केंद्र सरकार द्वारा तमिल पहचान को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर करने के प्रयास का हिस्सा है।
टैगोर ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व पर तमिल भाषा, संस्कृति और राज्य के संवैधानिक अधिकारों की बार-बार अनदेखी करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि तमिलनाडु ने भारत की एकता को सदैव कायम रखा है और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किंतु राज्य ने अपनी भाषाई विरासत और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को भी समान महत्व दिया है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और तमिलनाडु के बीच भाषा नीति, राज्यपाल की भूमिका और सांस्कृतिक स्वायत्तता को लेकर तनाव पहले से ही बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि राज्यपाल कार्यालय द्वारा इस प्रकार के प्रोटोकॉल निर्देश राज्य सरकार की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को दरकिनार करने की कोशिश है। यह विवाद तमिलनाडु में भाषाई अस्मिता की राजनीति को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।
आगे क्या होगा
28 जुलाई को होने वाले दीक्षांत समारोह से पहले यह विवाद राजनीतिक रूप से और गहरा हो सकता है। अभी तक राज्यपाल कार्यालय या केंद्र सरकार की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। टैगोर की माँग पर अमित शाह का रुख और विश्वविद्यालय प्रशासन का अंतिम निर्णय इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेगा।