तमिल थाई वाजथु पहले गाने पर BJP नेता नारायणन तिरुपति बोले — 'कोई विवाद नहीं होना चाहिए'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता नारायणन तिरुपति ने शनिवार, 29 अगस्त को स्पष्ट किया कि तमिलनाडु के राज्य गीत 'तमिल थाई वाजथु' को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से पहले गाने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि गाने का क्रम नहीं, बल्कि भावना मायने रखती है — और तमिलनाडु भारत का अभिन्न अंग है।
मुख्य बयान
तिरुपति ने कहा, 'तमिल थाई वाजथु, हमारा राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान — ये तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इनमें से किसे पहले, दूसरे या तीसरे नंबर पर गाया जाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये सभी हमारी जीवनरेखा हैं।' उन्होंने आगे कहा, 'अगर लोग तमिलनाडु राज्य गीत को पहले गाना चाहते हैं, तो इसमें कोई समस्या नहीं है — इसे कोई विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए।'
विवाद की पृष्ठभूमि
यह बयान उस विवाद के बीच आया है जो तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर जेसीडी प्रभाकर के एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उठा। प्रभाकर ने 8 और 9 अगस्त को चेन्नई में आयोजित गर्भपात-विरोधी रैली '5वें नेशनल मार्च फॉर लाइफ' में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की थी। गौरतलब है कि यह रैली एक विशेष धार्मिक दृष्टिकोण से संचालित मानी जाती है, जिसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।
स्पीकर पर आरोप
तिरुपति ने स्पीकर प्रभाकर पर सीधा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अपने संवैधानिक पद का उपयोग एक विशेष धर्म को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'जेसीडी प्रभाकर शुरू से ही ईसाई धर्म के समर्थक रहे हैं और उसे बढ़ावा देने की कोशिश करते रहे हैं। किसी की अपनी आस्था में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन लोकतंत्र में संवैधानिक पद का उपयोग किसी एक धर्म को प्रोत्साहित करने के लिए नहीं होना चाहिए।'
मुख्यमंत्री को सलाह
BJP नेता ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से अपील की कि वे स्पीकर को ऐसे कार्यों से रोकें जो टीवीके (तमिझागा वेट्री कषगम) नेतृत्व वाली सरकार की छवि को नुकसान पहुँचा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी ने हिंदू धर्म के संदर्भ में इसी प्रकार का आचरण किया होता, तो उसे तुरंत 'सांप्रदायिक' करार दिया जाता — यह दोहरा मानदंड स्वीकार्य नहीं है।
आगे की स्थिति
तमिलनाडु में राज्य गीत बनाम राष्ट्रगान के क्रम को लेकर यह पहली बार नहीं है कि राजनीतिक बहस छिड़ी हो। यह विवाद राज्य की पहचान और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन की उस व्यापक बहस का हिस्सा है जो दक्षिण भारत में समय-समय पर उभरती रहती है। अब देखना यह होगा कि स्पीकर प्रभाकर और सत्तारूढ़ दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।