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तिरुप्परनकुंद्रम दीपम विवाद: तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

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तिरुप्परनकुंद्रम दीपम विवाद: तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

सारांश

तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर 'दीपाथून' पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति दी गई थी। हाई कोर्ट ने सरकार की कानून-व्यवस्था संबंधी आशंकाओं को 'काल्पनिक' बताकर खारिज किया था।

मुख्य बातें

तमिलनाडु सरकार ने 23 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी।
विवाद तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित 'दीपाथून' (पत्थर के खंभे) पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति से जुड़ा है।
मद्रास उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने सांप्रदायिक तनाव की सरकारी आशंकाओं को 'काल्पनिक भूत' बताकर खारिज किया।
उच्च न्यायालय ने राज्य को चेतावनी दी कि शांतिपूर्ण पूजा सुनिश्चित करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
सर्वोच्च न्यायालय में राज्य का पक्ष अधिवक्ता बी.
करुणाकरन रख रहे हैं।

तमिलनाडु सरकार ने मंगलवार, 23 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें मदुरै जिले की ऐतिहासिक तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित दरगाह के निकट मौजूद पत्थर के खंभे — जिसे स्थानीय रूप से 'दीपाथून' कहा जाता है — पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति दी गई थी। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता बी. करुणाकरन सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी कर रहे हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर प्रसिद्ध अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर और पहाड़ी की चोटी के निकट एक दरगाह एक साथ स्थित हैं। इस साझा धार्मिक स्थल पर रीति-रिवाजों को लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा है। कार्तिगई दीपम का पर्व हिंदू परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, और भक्त इसे ऐतिहासिक रूप से निर्धारित पत्थर के खंभे पर जलाने का अधिकार माँगते रहे हैं।

उच्च न्यायालय का रुख

इस वर्ष की शुरुआत में मद्रास उच्च न्यायालय की एक डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मंदिर प्रशासन को पारंपरिक स्थानों के अतिरिक्त पहाड़ी की चोटी पर स्थित दीपाथून पर भी दीपम जलाने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि इस अनुमति से सांप्रदायिक तनाव और कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

एकल न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए राज्य की आशंकाओं को 'काल्पनिक भूत' करार दिया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जिस सरकार के पास व्यापक प्रशासनिक और पुलिस शक्तियाँ हैं, वह मंदिर परिसर में होने वाले एक धार्मिक आयोजन के दौरान शांति बनाए रखने में असमर्थ क्यों होगी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष में एक बार मंदिर के कुछ प्रतिनिधियों द्वारा निर्धारित खंभे पर दीपक जलाना प्रशासन की क्षमता से बाहर नहीं है।

सरकार की आपत्तियाँ और न्यायालय की चेतावनी

सुनवाई के दौरान पूर्ववर्ती द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार ने तर्क दिया था कि दरगाह के निकट यह रस्म अदा करने की इजाजत देने से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। हालाँकि, उच्च न्यायालय ने इन चिंताओं को महज अटकलें बताते हुए अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने राज्य सरकार को यह भी चेतावनी दी कि वह ऐसी आपत्तियों के माध्यम से किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने से बचे, और इस बात पर बल दिया कि शांतिपूर्ण पूजा सुनिश्चित करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

सर्वोच्च न्यायालय में अपील का महत्व

उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणियों के बावजूद राज्य सरकार ने अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस अपील पर शीर्ष अदालत का निर्णय तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़े संवेदनशील धार्मिक और प्रशासनिक प्रश्नों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। यह मामला भारत में साझे धार्मिक स्थलों पर परंपरागत अधिकारों और राज्य की कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारियों के बीच के नाजुक संतुलन की व्यापक बहस से भी जुड़ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब उच्च न्यायालय ने न केवल अपील खारिज की, बल्कि सरकार की मंशा पर ही सवाल उठाए। यह मामला उजागर करता है कि साझे धार्मिक स्थलों पर परंपरागत अधिकारों और राज्य के विवेकाधिकार के बीच की रेखा कितनी पतली और विवादास्पद है। आलोचकों का कहना है कि जब उच्च न्यायालय जैसी संस्था 'काल्पनिक भूत' जैसे शब्दों का प्रयोग करे, तो राज्य सरकार का उसी मुद्दे पर उच्चतर न्यायालय जाना प्रशासनिक दृढ़ता कम और राजनीतिक संकेत अधिक लगता है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय न केवल इस पहाड़ी के लिए, बल्कि देशभर में ऐसे मिश्रित धार्मिक स्थलों के प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करेगा।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिरुप्परनकुंद्रम दीपम विवाद क्या है?
यह विवाद मदुरै जिले की तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित 'दीपाथून' (पत्थर के खंभे) पर कार्तिगई दीपम जलाने के अधिकार से जुड़ा है। इस पहाड़ी पर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर और एक दरगाह दोनों स्थित हैं, जिससे धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर वर्षों से तनाव बना हुआ है।
मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला दिया था?
मद्रास उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मंदिर प्रशासन को दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने सरकार की सांप्रदायिक तनाव की आशंकाओं को 'काल्पनिक भूत' बताकर खारिज किया और कहा कि शांति बनाए रखना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील क्यों की?
राज्य सरकार का तर्क है कि दरगाह के निकट यह धार्मिक रस्म अदा करने की अनुमति देने से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है और सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। हाई कोर्ट से राहत न मिलने पर सरकार ने अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
इस मामले का क्या महत्व है?
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के धार्मिक और प्रशासनिक प्रश्नों पर दूरगामी असर डाल सकता है। यह मामला देशभर में साझे धार्मिक स्थलों पर परंपरागत अधिकारों और राज्य के विवेकाधिकार के बीच संतुलन की व्यापक बहस से भी जुड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार का पक्ष कौन रख रहा है?
सर्वोच्च न्यायालय में राज्य सरकार का पक्ष अधिवक्ता बी. करुणाकरन रख रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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