पाकिस्तान के आतंकवाद खत्म करने के दावे खोखले? शहबाज से शहबाज तक — रिकॉर्ड बोलता है
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में स्वीकार किया है कि उनके देश में आतंकवादी मौजूद रहे हैं, लेकिन अब उन पर 'नियंत्रण' पा लिया गया है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के ही रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनके देश की सरकारें 30 वर्षों से आतंकवादियों का समर्थन करती रही हैं। यह बयान 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए उस हमले के कुछ दिनों बाद आया था, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई थी।
स्वीकारोक्ति और दावों का अंतर्विरोध
ख्वाजा आसिफ ने जिस इंटरव्यू में 30 वर्षों की आतंकी मदद स्वीकार की, उसी में उन्होंने दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा 'बीते समय का नाम' है और अब उसका अस्तित्व नहीं है। यह टिप्पणी तब की गई जब लश्कर से जुड़े संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट ने पहलगाम हमले की जिम्मेदारी ली थी। आलोचकों का कहना है कि एक ही साँस में 30 वर्षों की संलिप्तता स्वीकार करना और फिर आतंकी संगठन के 'अस्तित्व न रहने' का दावा करना — ये दोनों बातें विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।
वरिष्ठ नेताओं की नामित आतंकवादी से मुलाकात
करीब चार महीने पहले ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिनमें प्रधानमंत्री के राजनीतिक मामलों के सलाहकार और अंतर-प्रांतीय समन्वय मामलों के संघीय मंत्री सीनेटर राणा सनाउल्लाह खान समेत वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को वैश्विक स्तर पर नामित आतंकवादी हाफिज तल्हा सईद के साथ बातचीत करते देखा गया। तल्हा सईद लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का पुत्र है। हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी घोषित कर रखा है।
इस वर्ष जून में आतंकी संगठनों से जुड़े कुछ नेताओं को पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के भाई के अंतिम संस्कार में देखे जाने की खबरें भी आईं। सोशल मीडिया पर आई तस्वीरों में लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख सैफुल्लाह कसूरी और पाकिस्तान मरकजी मुस्लिम लीग (PMML) के अध्यक्ष इनाम-उर-रहमान कम्बोह दिखाई दिए। कसूरी को अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले का कथित साजिशकर्ता बताया गया है, जबकि PMML को लश्कर का राजनीतिक चेहरा कहा जाता है।
ऐतिहासिक साक्ष्य — एक के बाद एक मामले
पाकिस्तान में आतंकियों की मौजूदगी का इतिहास कई दशकों पुराना है। 2001 में भारतीय संसद पर हमले और 2019 के पुलवामा आत्मघाती हमले में कथित भूमिका निभाने वाले जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के पाकिस्तान में होने के आरोप लंबे समय से लगाए जाते रहे हैं।
2008 के मुंबई आतंकी हमलों — जिनमें विदेशी नागरिकों समेत 166 लोगों की जान गई — की साजिश रचने का आरोप लश्कर-ए-तैयबा पर है। हाल की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हत्या की कई कोशिशों के मद्देनजर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हाफिज सईद की सुरक्षा बढ़ाकर उसे लाहौर में कड़ी सुरक्षा वाले एक ठिकाने पर रखा है।
2003 में अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य खालिद शेख मोहम्मद को रावलपिंडी से पकड़ा गया था। उसे 11 सितंबर 2001 के अमेरिकी हमलों — जिनमें करीब 3,000 लोगों की जान गई — की साजिश के प्रमुख सूत्रधारों में माना जाता है। 2011 में अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य अकादमी के निकट एबटाबाद में पाया गया। अंतरराष्ट्रीय आतंकी गतिविधियों के साथ पाकिस्तान के संबंध के संदर्भ में 2005 के लंदन बम धमाकों और 2010 के न्यूयॉर्क टाइम्स स्क्वायर में नाकाम हमले की कोशिश से जुड़े लोगों के पाकिस्तान स्थित नेटवर्क से संबंधों का भी उल्लेख किया जाता रहा है।
सेना और नागरिक सरकार का असमान समीकरण
विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय वाले शहर रावलपिंडी का इस्लामाबाद की नागरिक सरकार पर गहरा प्रभाव है। हाल के वर्षों में सेना प्रमुख सैयद आसिम मुनीर की अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मामलों में बढ़ती सक्रिय भूमिका को इसके उदाहरण के तौर पर देखा गया है। लेखकों ने तर्क दिया है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए शक्तिशाली सेना प्रमुख की ओर से बोलना संभव नहीं, खासकर ऐसे समय में जब हाल के वर्षों में कानूनी बदलावों के जरिए सेना प्रमुख की शक्तियों में और बढ़ोतरी हुई है। विश्लेषक ओवेन एल. सिर्स ने अपनी किताब में लिखा है कि आईएसआई पर प्रधानमंत्री के बजाय सेना प्रमुख का प्रभाव रहता है।
आगे क्या होगा
रिपोर्टों के अनुसार, जब तक आतंकवादी संगठनों के प्रमुख और कमांडर पाकिस्तान में बिना प्रभावी कार्रवाई के मौजूद रहते हैं, तब तक आतंकवाद खत्म करने के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहेंगे। आतंकी नेटवर्क के खिलाफ ठोस और सत्यापन-योग्य कार्रवाई ही पाकिस्तान के बदले हुए रुख की असली कसौटी होगी।