आतंकवाद बंद हो तो बात हो: सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती का पाकिस्तान पर कड़ा रुख
सारांश
मुख्य बातें
अजमेर दरगाह के उत्तराधिकारी और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के चेयरमैन सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने 2 जुलाई को भारत-पाकिस्तान वार्ता पर अपना स्पष्ट रुख रखते हुए कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने का ठोस प्रमाण नहीं देता, तब तक किसी भी बातचीत का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं चल सकते — यह भारत सरकार का भी सुस्थापित रुख है।
मुख्य बयान
चिश्ती ने अजमेर में कहा, 'भारत सरकार का हमेशा यही रुख रहा है कि सभी विवाद बातचीत की मेज पर सुलझाए जाएं। भारत पाकिस्तान को साफ शब्दों में बता चुका है कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बातचीत का स्वागत है, परंतु पाकिस्तान जब तक आतंकवादियों को पनाह देना बंद नहीं करता, वार्ता बेमानी होगी।
117 हस्तियों के पत्र पर प्रतिक्रिया
गौरतलब है कि हाल ही में भारत और पाकिस्तान की 117 著名 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर दोनों देशों के बीच बातचीत पुनः शुरू करने और सामान्य संबंध बहाल करने की अपील की थी। चिश्ती ने इस पत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन हस्तियों की मंशा वे खुद बेहतर जानते हैं।
पाकिस्तान में आतंकियों की खुली मौजूदगी पर चिंता
चिश्ती ने कहा कि पाकिस्तान में सार्वजनिक कार्यक्रमों, जनाजों और सरकारी आयोजनों में ऐसे व्यक्ति खुलकर घूमते हैं जिन पर संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादी होने का आरोप है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे देश पर भरोसा कैसे किया जाए और उसके साथ बैठकर सार्थक बातचीत कैसे हो।
पहलगाम हमले का संदर्भ
चिश्ती ने पहलगाम आतंकी हमले सहित अन्य घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन हमलों में आम नागरिक, युवा और जवान शहीद हुए हैं। उनके अनुसार पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है कि एक तरफ बातचीत की मेज पर बैठो और दूसरी तरफ आतंकी हमले करवाओ। यह विरोधाभास ही किसी भी शांति प्रक्रिया की सबसे बड़ी बाधा है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका पर टिप्पणी
पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच कथित मध्यस्थता की भूमिका का उल्लेख करते हुए चिश्ती ने कहा कि इससे पाकिस्तान का आतंकवाद को लेकर 'काला चेहरा' कतई नहीं बदलता। उन्होंने दोहराया कि जब तक पाकिस्तान अपने दिल और दिमाग से आतंकवाद समाप्त करने का फैसला नहीं लेता, किसी भी वार्ता से सकारात्मक परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती।