कावेरी विवाद: तमिलनाडु नेताओं की कर्नाटक से माँग — रोज़ाना 3000 क्यूसेक पानी तुरंत छोड़ें
सारांश
मुख्य बातें
कावेरी जल विवाद एक बार फिर केंद्र में आ गया है, जब 31 जुलाई को नई दिल्ली में तमिलनाडु के नेताओं ने कर्नाटक से प्रतिदिन 3000 क्यूसेक पानी तत्काल छोड़ने की माँग की। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम और मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कषगम (MDMK) के प्रधान सचिव एवं सांसद दुरई वाइको ने इस मुद्दे पर अलग-अलग बयान दिए।
नेताओं की माँग और तर्क
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा, 'हर किसी के पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं। जैसे कर्नाटक के पास कानूनी रास्ते हैं, वैसे ही तमिलनाडु के पास भी हैं। हमारा मानना है कि कावेरी प्रबंधन बोर्ड ने जो समझौता और आदेश दिया है, उसे पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए।'
MDMK सांसद दुरई वाइको ने इस विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला 40 से 50 वर्षों से चला आ रहा है। उन्होंने 2007 में गठित ट्रिब्यूनल के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ऊपरी तटीय राज्य होने के नाते कर्नाटक की जिम्मेदारी है कि वह तमिलनाडु को आवश्यकतानुसार पानी उपलब्ध कराए।
तमिलनाडु के नेता शशिकांत सेंथिल ने कहा, 'यह कोई विवाद नहीं है। सब कुछ साफ है। विवाद पहले ही सुलझ चुका है। पानी के बंटवारे का फैसला हो चुका है। कावेरी जल संसाधन प्रबंधन बोर्ड का आदेश है कि कर्नाटक को हर दिन 3000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ना होगा, ताकि वहाँ की फसलें बच सकें। हम कर्नाटक सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह यह पानी तुरंत छोड़े।'
कावेरी विवाद की पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच दशकों पुराना कानूनी और राजनीतिक संघर्ष है। मूल समस्या यह है कि नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित कर्नाटक और निचले हिस्से में स्थित तमिलनाडु — दोनों को सिंचाई और पेयजल के लिए इस नदी पर निर्भर रहना पड़ता है।
गौरतलब है कि 2007 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने अंतिम फैसला सुनाया था, जिसमें प्रत्येक राज्य के लिए पानी का हिस्सा निर्धारित किया गया था। इसके बावजूद गर्मियों और मानसून-पूर्व महीनों में जल-वितरण को लेकर तनाव बना रहता है।
किसानों पर असर
प्रत्येक वर्ष गर्मियों और सूखे के महीनों में नदी का जलस्तर घट जाता है, जिससे तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्र के किसानों की फसलें संकट में पड़ जाती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब खरीफ सीजन की बुवाई चल रही है और पानी की माँग अपने चरम पर है। किसानों में बढ़ती नाराजगी के बीच दोनों राज्यों में विरोध प्रदर्शन की आशंका भी बनी रहती है।
आगे क्या होगा
तमिलनाडु के नेताओं ने संकेत दिया है कि यदि कर्नाटक सरकार बोर्ड के आदेश का पालन नहीं करती, तो वे कानूनी विकल्पों का सहारा लेंगे। कावेरी जल संसाधन प्रबंधन बोर्ड के आदेश को लागू कराने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर भी है, और इस मुद्दे पर केंद्रीय हस्तक्षेप की माँग भी उठाई जा रही है।