कावेरी जल विवाद: मणिकम टैगोर ने कर्नाटक से CWRC आदेश तुरंत लागू करने की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी (TNCC) के अध्यक्ष और विरुधुनगर के सांसद मणिकम टैगोर ने बुधवार, 29 जुलाई को कर्नाटक सरकार से कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के उस आदेश को बिना देरी के लागू करने की अपील की, जिसमें तमिलनाडु को 4 टीएमसी कावेरी जल छोड़ने का निर्देश दिया गया है। टैगोर ने चेतावनी दी कि इस आदेश में किसी भी तरह की देरी या उसे चुनौती देने की कोशिश दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच पहले से चले आ रहे तनाव को और गहरा कर देगी।
CWRC का आदेश और कर्नाटक का रुख
कावेरी जल विनियमन समिति ने मंगलवार, 28 जुलाई को कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह 29 जुलाई से 15 दिनों तक 3,500 क्यूसेक प्रति दिन की दर से तमिलनाडु को 4 टीएमसी पानी छोड़े। हालाँकि, कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री के. रामलिंगा रेड्डी ने कहा कि राज्य सूखे की स्थिति और जलाशयों में सीमित भंडार का हवाला देते हुए इस आदेश के खिलाफ कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के समक्ष अपील दायर करने पर विचार कर रहा है और वह फिलहाल पानी छोड़ने की स्थिति में नहीं है।
यह ऐसे समय में आया है जब दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल बँटवारे को लेकर दशकों पुराना विवाद एक बार फिर सतह पर आ गया है।
टैगोर की तीखी आलोचना
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में मणिकम टैगोर ने रेड्डी के बयान को 'गैर-जिम्मेदाराना' करार दिया। उन्होंने कहा कि जब सहयोग की आवश्यकता है, तब इस तरह के बयान केवल अनावश्यक मनमुटाव पैदा करते हैं।
टैगोर ने अपने पोस्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा, 'पानी तुरंत छोड़ा जाना चाहिए। कर्नाटक सरकार को बिना किसी बहाने के CWRC के आदेश को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। क्योंकि कावेरी डेल्टा के किसान खेती के काम को जारी रखने के लिए बेसब्री से पानी का इंतजार कर रहे हैं।'
तमिलनाडु में कृषि संकट
टैगोर ने बताया कि पानी की कमी के कारण तमिलनाडु में कुरुवई की खेती को पहले ही भारी नुकसान हो चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कावेरी का पानी समय पर नहीं छोड़ा गया तो आने वाली सांबा फसल भी खतरे में पड़ जाएगी, जिससे राज्य के हजारों किसानों की आजीविका प्रभावित होगी।
जल बँटवारे के नवीनतम आँकड़ों का हवाला देते हुए टैगोर ने दावा किया कि 26 जुलाई तक तमिलनाडु को निर्धारित 35.391 टीएमसी पानी के मुकाबले केवल 3.543 टीएमसी पानी ही मिला है — यानी देय मात्रा का मात्र 10.01 प्रतिशत। इस प्रकार चालू जल वर्ष में तमिलनाडु को कुल 9.46 टीएमसी पानी की कमी का सामना करना पड़ा है।
संघीय ढाँचे और कानूनी बाध्यता का तर्क
टैगोर ने तर्क दिया कि कावेरी विवाद से संबंधित न्यायिक और वैधानिक आदेशों का कार्यान्वयन भारत के संघीय ढाँचे की भावना को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। उनके अनुसार, कानूनी रूप से बाध्यकारी फैसलों और निर्देशों का सम्मान करना ही नदी-तटीय राज्यों के बीच जल का समान बँटवारा सुनिश्चित करने और आपसी सद्भाव बनाए रखने का एकमात्र मार्ग है।
गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद दशकों से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच राजनीतिक और कानूनी टकराव का केंद्र रहा है, और सर्वोच्च न्यायालय तथा CWRC जैसी वैधानिक संस्थाएँ इसके समाधान के लिए अधिकृत हैं। यदि कर्नाटक CWMA में अपील दायर करता है, तो यह विवाद एक बार फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकता है।