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PM मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित: 'स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है'

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PM मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित: 'स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है'

सारांश

PM मोदी ने 18 सितंबर को 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सज्जनप्रशंसा' अध्याय का 133वाँ श्लोक साझा किया — 'स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है।' मरुभूमि के रूपक से सत्पुरुष के स्वावलंबन और परोपकार का संदेश देती यह पंक्तियाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा की गहराई को दर्शाती हैं।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 18 सितंबर 2026 को एक संस्कृत सुभाषित सोशल मीडिया पर साझा किया।
श्लोक 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सज्जनप्रशंसा' अध्याय का 133वाँ श्लोक है।
श्लोक का भावार्थ: स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है; दूसरों का आश्रय बनना सच्ची महानता।
सत्पुरुष की उपयोगिता को मरुभूमि (रेगिस्तान) के रूपक से समझाया गया है।
इस ग्रंथ का संकलन विद्वान नारायण राम आचार्य (काव्यतीर्थ) द्वारा किया गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 सितंबर 2026 को एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए स्वाधीनता, समृद्धि और परोपकार का संदेश दिया। यह श्लोक प्राचीन ग्रंथ 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सज्जनप्रशंसा' अध्याय से लिया गया है और सत्पुरुषों की महत्ता को रेखांकित करता है।

कौन सा श्लोक साझा किया गया

पीएम मोदी ने 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सामान्यप्रकरणम्' के अंतर्गत 24वें अध्याय 'सज्जनप्रशंसा' का 133वाँ श्लोक साझा किया। श्लोक इस प्रकार है: 'स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥'

इस श्लोक का हिंदी भावार्थ है कि स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है और दूसरों का आश्रय व आधार बनना ही सच्ची महानता है। जैसे मरुभूमि में छाया और जीवन दुर्लभ वरदान होते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ पुरुष का जीवन परोपकार एवं लोक-कल्याण के लिए अभीष्ट होता है।

श्लोक का संदेश और रूपक

इस श्लोक में सत्पुरुष के गुणों को मरुभूमि (रेगिस्तान) के रूपक से समझाया गया है। रेगिस्तान में छाया और जीवनदायी तत्व अत्यंत दुर्लभ होते हैं — ठीक वैसे ही समाज में स्वावलंबी और परोपकारी सज्जन भी विरल किंतु अमूल्य होते हैं।

श्लोक में तीन प्रमुख भाव व्यक्त किए गए हैं: पहला, स्वाधीन समृद्धि; दूसरा, दूसरों के लिए उपयोगी होना; और तीसरा, ऊँचा उठकर दूसरों को छाया व आश्रय प्रदान करना। इसके ज़रिये सत्पुरुष के जीवन की सार्थकता उसके स्वावलंबन और समाज-सेवा में बताई गई है।

ग्रंथ का परिचय

'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' संस्कृत साहित्य का एक विशाल संकलन ग्रंथ है, जिसमें विभिन्न कालखंडों के चुने हुए श्लोकों को एक साथ संग्रहीत किया गया है। इस ग्रंथ का संकलन विद्वान नारायण राम आचार्य (काव्यतीर्थ) द्वारा किया गया था।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर संस्कृत के सुभाषितों और प्राचीन भारतीय ग्रंथों के श्लोक साझा करते रहे हैं, जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है।

व्यापक संदर्भ

यह सुभाषित ऐसे समय में साझा किया गया है जब सामाजिक स्वावलंबन और लोक-कल्याण की अवधारणाएँ राष्ट्रीय विमर्श में केंद्रीय स्थान रखती हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से प्रेरणा लेकर समकालीन मूल्यों को रेखांकित करने की यह परंपरा भारतीय सार्वजनिक जीवन में गहरी जड़ें रखती है।

आने वाले दिनों में भी प्रधानमंत्री की ओर से इस तरह के सांस्कृतिक संदेशों की निरंतरता अपेक्षित है, जो भारतीय दर्शन और जीवन-मूल्यों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक ऐसे दौर में जब आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय नीति का केंद्र है, संयोग नहीं लगता। हालाँकि इस प्रकार के सांस्कृतिक संदेश व्यापक जन-समर्थन जुटाते हैं, आलोचक यह भी पूछते हैं कि क्या ये श्लोक नीतिगत जवाबदेही की जगह ले रहे हैं।
RashtraPress
18 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने कौन सा संस्कृत श्लोक साझा किया?
PM मोदी ने 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सज्जनप्रशंसा' अध्याय का 133वाँ श्लोक साझा किया: 'स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥' इसका भावार्थ है कि स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है और दूसरों का आश्रय बनना सच्ची महानता है।
'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' क्या है?
'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' संस्कृत साहित्य का एक विशाल संकलन ग्रंथ है जिसमें विभिन्न कालखंडों के श्रेष्ठ श्लोकों को एक साथ संग्रहीत किया गया है। इसका संकलन विद्वान नारायण राम आचार्य (काव्यतीर्थ) द्वारा किया गया था।
इस श्लोक में मरुभूमि के रूपक का क्या अर्थ है?
मरुभूमि (रेगिस्तान) में छाया और जीवनदायी तत्व अत्यंत दुर्लभ होते हैं। इस रूपक के माध्यम से श्लोक में बताया गया है कि समाज में स्वावलंबी और परोपकारी सत्पुरुष भी उतने ही दुर्लभ और मूल्यवान होते हैं।
इस सुभाषित का मुख्य संदेश क्या है?
इस सुभाषित का मुख्य संदेश यह है कि वास्तविक वैभव स्वाधीन समृद्धि में है, न कि दूसरों पर निर्भरता में। साथ ही, सच्ची महानता दूसरों के लिए उपयोगी और सहायक बनने में निहित है।
PM मोदी किस अध्याय से यह श्लोक लाए?
यह श्लोक 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' के 'सामान्यप्रकरणम्' के अंतर्गत 24वें अध्याय 'सज्जनप्रशंसा' का 133वाँ श्लोक है। यह अध्याय सज्जन एवं सत्पुरुषों के गुणों की प्रशंसा को समर्पित है।
राष्ट्र प्रेस
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