PM मोदी ने एक्स पर साझा किया महाभारत का श्लोक: कर्मठ, शूरवीर और विद्वान को समृद्धि कभी नहीं छोड़ती
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 16 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी नियमित 'सुभाषितम' श्रृंखला के अंतर्गत महाभारत के शान्तिपर्व का एक प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक साझा किया। इस श्लोक में कर्तव्यनिष्ठ, वीर, धैर्यवान और ज्ञानी व्यक्ति की समृद्धि के विषय में अमूल्य संदेश दिया गया है।
कौन-सा श्लोक साझा किया
प्रधानमंत्री मोदी ने महाभारत के शान्तिपर्व का यह श्लोक पोस्ट किया: 'अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥' इस श्लोक का हिंदी में अर्थ है — जिस व्यक्ति का मन दुविधारहित हो और जो कर्मठ, शूरवीर, धैर्यवान तथा विद्वान हो, समृद्धि उसका साथ कभी नहीं छोड़ती, जैसे सूर्य का साथ उसकी किरणें कभी नहीं छोड़तीं।
श्लोक का शब्द-दर-शब्द विश्लेषण
प्रधानमंत्री ने इस श्लोक के प्रत्येक पद का विस्तृत अर्थ भी स्पष्ट किया। अद्वैधमनसं का अर्थ है — जिसका मन दुविधा से मुक्त हो और जो पूर्णतः एकाग्र व दृढ़निश्चयी हो। युक्तं का तात्पर्य है — जो संयमी, अनुशासित और अपने कार्य में सतत संलग्न रहने वाला हो।
शूरं यानी वीर और पराक्रमी, धीरं यानी धैर्यवान — जो संकट के क्षणों में भी विचलित न हो। विपश्चितम् का अर्थ है — जो विद्वान, बुद्धिमान और शास्त्र का गहरा ज्ञाता हो। अंत में 'न श्रीः सन्त्यजते नित्यम्' — अर्थात लक्ष्मी (समृद्धि) ऐसे व्यक्ति को कभी नहीं छोड़ती — और यह उपमा 'आदित्यमिव रश्मयः' से दी गई है, जैसे किरणें सूर्य का साथ कभी नहीं छोड़तीं।
सुभाषितम श्रृंखला की पृष्ठभूमि
यह प्रधानमंत्री मोदी द्वारा एक्स पर साझा किए जाने वाले संस्कृत सुभाषितों की क्रमबद्ध श्रृंखला का नवीनतम पोस्ट है। गौरतलब है कि इससे पहले 11 सितंबर को उन्होंने 'चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता। धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्म: सनातन:' श्लोक साझा किया था, जिसका संदेश था कि जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है कि वह सेवा, समर्पण और कुशल नेतृत्व के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में न्याय, समरसता और लोककल्याण को बढ़ावा दे।
इससे भी पूर्व, 10 जून को उन्होंने 'सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥' श्लोक प्रकाशित किया था, जिसका भाव था कि जो जनप्रतिनिधि सेवा को अपना धर्म मानकर निरंतर जनहित में कार्य करता है और विनम्रता के साथ समाज की उन्नति के लिए समर्पित रहता है, वही वास्तविक जनविश्वास, यश और समृद्धि प्राप्त करता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्त्व
प्रधानमंत्री की यह 'सुभाषितम' श्रृंखला प्राचीन भारतीय ग्रंथों — विशेषकर महाभारत, रामायण और अन्य शास्त्रों — के नीतिपरक श्लोकों को समकालीन जनजीवन से जोड़ने का एक सुनियोजित प्रयास मानी जाती है। यह ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक जीवन में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति रुचि फिर से बढ़ रही है। इस श्रृंखला के माध्यम से वे कर्म, अनुशासन, धैर्य और ज्ञान जैसे मूल्यों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं।
आने वाले सप्ताहों में प्रधानमंत्री की यह श्रृंखला जारी रहने की संभावना है, और नागरिकों व अध्येताओं के बीच इन श्लोकों पर व्यापक चर्चा देखी जाती रही है।