अल नीनो की मार: दक्षिण तमिलनाडु में ताड़ गुड़ ₹400/किलो पार, हज़ारों श्रमिक प्रभावित
सारांश
मुख्य बातें
अल नीनो के कारण हुई कम बारिश ने दक्षिण तमिलनाडु के पारंपरिक ताड़ गुड़ उद्योग को गहरी चोट पहुँचाई है। रामनाथपुरम, थूथुकुडी, तिरुनेलवेली और तेनकासी जिलों में फैले इस उद्योग में उत्पादन घटने से 11 अगस्त 2026 तक ताड़ के गुड़ की कीमतें असामान्य रूप से ऊँचाई पर पहुँच गई हैं। सयालकुडी में जो गुड़ पिछले महीने ₹350 प्रति किलो बिक रहा था, वह अब ₹400 प्रति किलो तक जा पहुँचा है।
उद्योग का विस्तार और महत्त्व
तमिलनाडु में सर्वाधिक ताड़ के पेड़ रामनाथपुरम जिले में हैं, जो राज्य की ताड़ गुड़ राजधानी माना जाता है। सयालकुडी, नरीप्पैयूर, मारियूर, कन्नीराजापुरम, मेलाचेलवानूर और मल्लत्तर जैसे गाँवों में हज़ारों श्रमिक पीढ़ियों से इस काम में लगे हैं। हर वर्ष जनवरी-फरवरी में 'पडनीर' (ताड़ का रस) संग्रह का मौसम शुरू होता है। श्रमिक पेड़ों से मीठा रस इकट्ठा कर उसे उबालकर 'करुपट्टी' यानी ताड़ का गुड़ तैयार करते हैं।
उत्पादन में भारी गिरावट
श्रमिकों के अनुसार, पिछले मानसून और उसके बाद के गर्मी के महीनों में वर्षा सामान्य से काफी कम रही, जिससे ताड़ के पेड़ों को पर्याप्त नमी नहीं मिली। इसका सीधा असर 'पडनीर' की उपलब्धता पर पड़ा और गुड़ उत्पादन में भारी कमी आई। मौजूदा उत्पादन सीजन के समाप्त होते ही आपूर्ति और घटने की आशंका है, जिससे आने वाले मानसून और सर्दियों के महीनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं — यह वही समय है जब माँग सामान्यतः अपने चरम पर होती है।
कीमतों का हाल और उत्पाद विविधता
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, उडांगुडी किस्म का पुराना स्टॉक इस समय लगभग ₹600 प्रति किलो और ताज़ा गुड़ लगभग ₹500 प्रति किलो बिक रहा है। थूथुकुडी जिले की 'उडांगुडी करुपट्टी' अपनी विशिष्ट पहचान और छोटे आकार के बावजूद सर्वाधिक महँगी है। इसके अलावा, 'पनंगालकंडु' (ताड़ की मिश्री) लगभग ₹800 प्रति किलो और 'सिल्लुकुरुपट्टी' लगभग ₹600 प्रति किलो के भाव पर बिक रही है — दोनों उत्पादों की बाज़ार में निरंतर माँग बनी रहती है।
श्रमिकों और व्यापारियों पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब ताड़ उद्योग पहले से ही आधुनिकीकरण और युवा पीढ़ी की इस परंपरागत काम में घटती रुचि की चुनौती झेल रहा है। उत्पादन घटने से श्रमिकों की आय पर सीधा असर पड़ा है, क्योंकि वे उत्पादित मात्रा के अनुसार कमाते हैं। व्यापारी सीधे श्रमिकों से गुड़ खरीदकर थोक और खुदरा बाज़ारों में भेजते हैं, इसलिए आपूर्ति में कमी पूरी मूल्य-श्रृंखला को प्रभावित कर रही है।
आगे की चुनौतियाँ
व्यापारियों का अनुमान है कि उत्पादन सीजन बंद होने के बाद कीमतों में और उछाल आ सकता है। गौरतलब है कि अल नीनो की स्थिति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, और अगले मानसून की स्थिति पर ही उद्योग की अगले वर्ष की सेहत निर्भर करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह के मौसमी व्यवधान भविष्य में और बार-बार हो सकते हैं, जिससे इस पारंपरिक उद्योग के दीर्घकालिक संरक्षण की आवश्यकता और बढ़ जाती है।