तिरुमूर्ति बांध में गाद निकालने का काम फिर शुरू, स्थानीय लोगों ने सख्त निगरानी की उठाई मांग
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के उडुमलपेट के निकट स्थित तिरुमूर्ति बांध में गाद निकालने का कार्य सरकार की अनुमति मिलने के बाद शुक्रवार, 22 अगस्त 2026 को एक बार फिर शुरू हो गया। हालांकि स्थानीय निवासियों ने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि मिट्टी निकालने और परिवहन में किसी भी प्रकार की अनियमितता रोकने के लिए कड़ी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
बांध का महत्व और पृष्ठभूमि
पश्चिमी घाट में स्थित तिरुमूर्ति बांध आसपास के वन क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों और नालों का जल संग्रह करता है। परम्बिकुलम-अलियार परियोजना (PAP) के अंतर्गत आने वाले अन्य बांधों से भी पानी इस जलाशय में लाया जाता है। यह बांध कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों की कृषि भूमि की सिंचाई में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
PAP योजना के तहत लगभग 3,76,152 एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त 'थाली' और 'वायपालयम' नहरों के माध्यम से पुरानी आयकट प्रणाली के तहत 3,044 एकड़ भूमि की सिंचाई होती है। इस जलाशय पर कई संयुक्त पेयजल योजनाएं भी निर्भर हैं।
मुख्य घटनाक्रम
ग्रीष्म काल में जलस्तर घटने का लाभ उठाते हुए किसानों ने जलाशय में संचित गाद निकालने की अनुमति माँगी थी। इस पर 27 जुलाई को कार्य प्रारंभ हुआ, परंतु कुछ ही दिनों में जिला प्रशासन को अनियमितताओं की शिकायतें प्राप्त हुईं। शिकायतों के आधार पर अधिकारियों ने 31 जुलाई को गाद निकालने का काम अस्थायी रूप से बंद करवाकर बांध स्थल का निरीक्षण किया।
इसके बाद किसानों ने राज्य सरकार से कार्य पुनः आरंभ करने की अपील की और यह मुद्दा तमिलनाडु विधानसभा में भी उठाया गया। किसानों का तर्क था कि पोषक तत्वों से समृद्ध यह गाद खेतों की उर्वरता और फसल उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। आखिरकार सरकार ने अनुमति दे दी और शुक्रवार को जलाशय से गाद निकालने का कार्य दोबारा शुरू हो गया।
स्थानीय लोगों की माँगें
स्थानीय निवासियों ने अधिकारियों से अनुरोध किया है कि प्रत्येक लाभार्थी द्वारा निकाली गई मिट्टी की मात्रा की जाँच की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उसे परमिट में निर्दिष्ट कृषि भूमि पर ही ले जाया जा रहा है। उन्होंने यह भी माँग की कि बांध के कमांड क्षेत्र से बाहर के लोग, जो किसान नहीं हैं, व्यावसायिक उद्देश्यों से मिट्टी न निकाल सकें।
निवासियों ने विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया कि केवल निर्धारित गाद ही निकाली जाए और बजरी, लाल मिट्टी या अन्य निर्माण सामग्री को जलाशय क्षेत्र से अवैध रूप से न ले जाया जाए।
आम जनता और किसानों पर असर
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि सख्त निगरानी हो तो इस पहल का वास्तविक लाभ किसानों को मिलेगा। जलाशय की गाद को उचित तरीके से खेतों में पहुँचाने से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा, फसल की पैदावार बढ़ेगी और किसानों की आजीविका सुदृढ़ होगी।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में जल संसाधन प्रबंधन और जलाशयों की भंडारण क्षमता को लेकर चर्चा तेज है। गाद निकालने की प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही ही तय करेगी कि यह पहल किसानों के लिए दीर्घकालिक रूप से कितनी फायदेमंद साबित होती है।