तमिलनाडु के 90 बांधों में जलस्तर 34% तक गिरा, पीने के पानी पर संकट गहराया
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के 90 बांधों में पानी का भंडार घटकर कुल क्षमता के मात्र 34 प्रतिशत पर आ गया है, जिससे राज्यभर में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हो गई है। 1 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 63 जलाशयों में पानी उनकी क्षमता के 25 प्रतिशत से भी नीचे चला गया है। लंबे समय तक बनी रही असामान्य गर्मी और देरी से आए मानसून ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
मौजूदा जलभंडार की स्थिति
जल संसाधन विभाग की निगरानी में आने वाले इन बांधों की कुल जल-संग्रहण क्षमता 224 हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट (टीएमसीएफटी) है। फिलहाल इनमें केवल 76.4 टीएमसीएफटी पानी उपलब्ध है, जो सामान्य से काफी कम है। 17 बांधों में जलस्तर और भी खराब स्थिति में है, जहाँ भंडारण मात्र 17 प्रतिशत के आसपास बताया जा रहा है।
कुछ जलाशयों में उपयोग योग्य पानी इतना कम हो गया है कि तलहटी की गाद और मिट्टी खुलकर दिखाई देने लगी है — जो किसी भी जलाशय के गंभीर रूप से रिक्त होने का स्पष्ट संकेत है। गौरतलब है कि ये बांध अलग-अलग नदियों पर बने हैं और खेती, पेयजल आपूर्ति तथा जलविद्युत उत्पादन — तीनों उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं।
गाद की समस्या से दोहरी मार
जल संकट को और जटिल बना रहा है जलाशयों में वर्षों से जमा हुई गाद और कचरा, जिसकी ठीक से सफाई नहीं की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जमाव बांधों की वास्तविक जल-संग्रहण क्षमता को सीमित कर देता है — अर्थात् अच्छी बारिश होने पर भी संग्रहीत पानी की मात्रा कागज़ी क्षमता से कम रह सकती है। पश्चिमी घाट में स्थित कई जलाशय वन्यजीवों और पक्षियों के लिए जलस्रोत भी हैं, इसलिए इनका सूखना पर्यावरणीय दृष्टि से भी चिंताजनक है।
अल-नीनो और असामान्य गर्मी का असर
आंकड़ों के अनुसार, हालाँकि ग्रीष्म ऋतु आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुकी है, फिर भी कई जिलों में असामान्य रूप से तेज़ गर्मी बनी हुई है। इसके पीछे अल-नीनो के प्रभाव को कारण माना जा रहा है, जिसने राज्य के मौसम चक्र को प्रभावित किया है। लंबे समय तक उच्च तापमान बने रहने से जलाशयों में वाष्पीकरण की दर भी बढ़ी है, जिससे मौजूदा भंडार और तेज़ी से घट रहा है।
आम जनता और किसानों पर असर
यदि आने वाले उत्तर-पूर्वी मानसून से पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो कई जिलों में घरेलू पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद कठिन हो जाएगा। जो किसान बांधों से छोड़े जाने वाले पानी पर सिंचाई के लिए निर्भर हैं, उनकी फसलों पर भी संकट मंडरा रहा है। जल संसाधन विभाग और पेयजल बोर्ड के अधिकारी फिलहाल उत्तर-पूर्वी मानसून की प्रतीक्षा में हैं, ताकि जलाशय पुनः भर सकें और आगामी महीनों की माँग पूरी की जा सके।
आगे क्या होगा
जलाशयों के पुनः भरने की संभावना पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि खाली हो चुके जलग्रहण क्षेत्रों में कितनी और कब बारिश होती है। यह स्थिति ऐसे समय में आई है जब राज्य पहले से ही जल-प्रबंधन की चुनौतियों से जूझ रहा है। विशेषज्ञ जलाशयों की नियमित गाद-सफाई और दीर्घकालिक जल-संरक्षण नीति की आवश्यकता पर ज़ोर दे रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसे संकटों से बचा जा सके।