तमिलनाडु में जलविद्युत उत्पादन 50% घटा, राज्य ₹16-20/यूनिट पर खरीद रहा महंगी बिजली
सारांश
मुख्य बातें
कमज़ोर दक्षिण-पश्चिम मानसून और प्रमुख जलाशयों में गंभीर जल-संकट के कारण तमिलनाडु में इस वर्ष जलविद्युत उत्पादन लगभग आधा रह गया है, जिससे राज्य को बिजली एक्सचेंज से ₹16 से ₹20 प्रति यूनिट की महंगी दरों पर बिजली खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है। 1 अप्रैल से 17 जुलाई 2025 के बीच राज्य में केवल 751.034 मिलियन यूनिट (MU) जलविद्युत का उत्पादन हुआ, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आँकड़ा 1,509.549 MU था।
उत्पादन में गिरावट के मुख्य कारण
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा, लंबे समय तक चली भीषण हीटवेव और जलाशयों में घटते जल-स्तर ने मिलकर जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन को बाधित किया। यह ऐसे समय हुआ जब जुलाई तक बिजली की माँग असाधारण रूप से ऊँचे स्तर पर बनी रही, जिससे राज्य की बिजली व्यवस्था पर दोहरा दबाव पड़ा।
स्थिति को और गंभीर बनाने में कर्नाटक से कावेरी नदी का पर्याप्त जल प्रवाह न मिलना भी एक अहम कारक रहा है। इससे उन जलाशयों में उपलब्ध पानी और घट गया जिन पर कई जलविद्युत परियोजनाएँ निर्भर हैं।
राज्य पर वित्तीय बोझ
जलविद्युत राज्य के लिए बिजली का सबसे सस्ता स्रोत है — इसकी उत्पादन लागत ₹1 प्रति यूनिट से भी कम रहती है। उत्पादन में आई कमी की भरपाई के लिए पिछले तीन महीनों में बिजली एक्सचेंज से ₹16 से ₹20 प्रति यूनिट की दर पर बिजली खरीदी गई। अधिकारियों के अनुसार, इस दौरान राज्य ने लगभग 2,000 MU बिजली बाहर से खरीदी, जिससे बिजली खरीद पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया है।
गौरतलब है कि आमतौर पर तमिलनाडु गर्मियों और अधिक माँग वाले मौसम में महंगे बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने के लिए जलविद्युत उत्पादन को अधिकतम रखता है। इस वर्ष वह रणनीति पूरी तरह उलट गई है।
जलाशयों की गाद और रखरखाव की चूक
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने जलाशयों के रखरखाव में लंबे समय से चली आ रही लापरवाही को भी उत्पादन गिरावट का एक प्रमुख कारण बताया है। उनके अनुसार, भवानीसागर और कुंदाह सहित कई जलाशयों में आखिरी बार वर्ष 2010 में गाद निकालने (डी-सिल्टिंग) का काम हुआ था, और उसके बाद कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया गया।
अधिकारियों का अनुमान है कि जलाशयों में गाद जमा होने से उनकी प्रभावी जल-भंडारण क्षमता लगभग 20 प्रतिशत तक घट चुकी है। इससे मानसून के दौरान पानी संग्रहित करने की क्षमता कम हुई और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर डी-सिल्टिंग होती तो जलाशयों की भंडारण क्षमता बेहतर रहती और राज्य को इतनी महंगी बिजली खरीदने की नौबत न आती।
आगे की स्थिति
अधिकारियों का कहना है कि यदि आने वाले हफ्तों में मानसून की गतिविधियाँ तेज़ नहीं हुईं और जलग्रहण क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो जलविद्युत उत्पादन अगले कुछ सप्ताह तक दबाव में ही रहेगा। यह संकट तमिलनाडु की ऊर्जा नीति में दीर्घकालिक जलवायु-अनुकूल सुधारों की ज़रूरत को एक बार फिर रेखांकित करता है।