विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी उछाल: भारत का फॉरेक्स रिजर्व 703.3 अरब डॉलर पर पहुंचा
सारांश
मुख्य बातें
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर मजबूती की राह पर लौटा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 25 अप्रैल 2025 को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 17 अप्रैल 2025 को समाप्त सप्ताह में देश का कुल फॉरेक्स रिजर्व 2.3 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 703.30 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
लगातार तीसरे सप्ताह सुधार का संकेत
यह बढ़ोतरी कोई अकेली घटना नहीं है — यह लगातार तीसरे सप्ताह की सकारात्मक प्रवृत्ति का हिस्सा है। इससे पहले, 3 अप्रैल 2025 को समाप्त सप्ताह में भंडार 9.063 अरब डॉलर की तेज बढ़त के साथ 697.121 अरब डॉलर हो गया था। फिर 10 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 3.825 अरब डॉलर की और वृद्धि दर्ज हुई।
यह क्रमिक सुधार इस बात का संकेत है कि आरबीआई की मुद्रा स्थिरीकरण नीति धीरे-धीरे असर दिखा रही है और विदेशी पूंजी प्रवाह (कैपिटल इनफ्लो) में भी कुछ सुधार आया है।
रिकॉर्ड स्तर से अभी भी नीचे — पृष्ठभूमि समझें
गौरतलब है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 27 फरवरी 2025 को समाप्त सप्ताह में ऐतिहासिक उच्चतम स्तर 728.494 अरब डॉलर तक पहुंचा था। लेकिन इसके बाद पश्चिम एशिया में सशस्त्र संघर्ष की तीव्रता बढ़ने, वैश्विक व्यापार अनिश्चितता और डॉलर की मजबूती के चलते भंडार में लगातार गिरावट देखी गई।
इस दौरान रुपए पर दबाव बढ़ा और आरबीआई को मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करते हुए डॉलर बेचने पड़े, जिससे भंडार घटा। अब वर्तमान भंडार अपने सर्वकालिक उच्च स्तर से करीब 25 अरब डॉलर नीचे है।
सोने का भंडार और SDR में भी इजाफा
देश के गोल्ड रिजर्व में भी उल्लेखनीय वृद्धि जारी है। यह 79 मिलियन डॉलर की बढ़त के साथ 122.13 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया है — जो कुल भंडार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैश्विक स्तर पर सोने की कीमतों में तेजी ने भी इस वृद्धि में योगदान दिया है।
स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) थोड़ा बढ़कर 18.84 अरब डॉलर हो गए। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास भारत की रिजर्व पोजीशन 14 मिलियन डॉलर की वृद्धि के साथ 48.70 अरब डॉलर हो गई।
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर असर
विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती सीधे तौर पर रुपए की स्थिरता से जुड़ी है। जब भंडार मजबूत होता है, तो आयातित वस्तुओं की कीमतें — जैसे कच्चा तेल, खाद्य तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स — स्थिर रहती हैं, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।
इसके अलावा, मजबूत भंडार विदेशी निवेशकों को भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा दिलाता है और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के नजरिए से भी देश की साख बनाए रखता है। आरबीआई के पास पर्याप्त भंडार होने से वह जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और आगे की राह
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो भारत विश्व के शीर्ष-5 सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है। चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद भारत इस सूची में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति में नरमी आती है, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आने वाले महीनों में फिर से 720-730 अरब डॉलर के स्तर को छू सकता है। आरबीआई की आगामी मौद्रिक नीति बैठक और वैश्विक बाजारों की दिशा इस पर निर्णायक असर डालेगी।