पाकिस्तान में हिरासत यातना की चौंकाने वाली रिपोर्ट: कानूनी खामियां और एनकाउंटर पर उठे सवाल
सारांश
Key Takeaways
- नेशनल कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स (NCHR) ने संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी समिति को वैकल्पिक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पाकिस्तान की कानूनी खामियां उजागर हैं।
- टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ एक्ट, 2022 के बावजूद जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन नगण्य है।
- यातना की परिभाषा में मानसिक पीड़ा शामिल नहीं, सजा के प्रावधान अस्पष्ट और पीड़ित पुनर्वास व्यवस्था अपर्याप्त है।
- पंजाब प्रांत में हाल के महीनों में सैकड़ों पुलिस मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में मौतें दर्ज, कुछ पर राजनीतिक सराहना भी।
- मुजफ्फरगढ़ की महिला स्वास्थ्यकर्मी के दो बेटों की कथित फर्जी एनकाउंटर में मौत ने न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
- पाकिस्तान ने 2010 में यातना विरोधी कन्वेंशन स्वीकार किया था, लेकिन जवाबदेही का अभाव आज भी जारी है।
इस्लामाबाद, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान में हिरासत यातना (कस्टोडियल एब्यूज) और कानूनी सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को लेकर नेशनल कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स (NCHR) ने संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी समिति को एक वैकल्पिक रिपोर्ट सौंपी है। यह रिपोर्ट यातना के खिलाफ कन्वेंशन (Convention Against Torture) के तहत पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं की समीक्षा से ठीक पहले प्रस्तुत की गई है। रिपोर्ट में टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022 के कमजोर क्रियान्वयन और व्यापक संस्थागत विफलताओं को रेखांकित किया गया है।
कानूनी ढांचे में क्या हैं प्रमुख खामियां
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने 2010 में यातना विरोधी कन्वेंशन को स्वीकार किया था, लेकिन डेढ़ दशक बाद भी जमीनी स्तर पर जवाबदेही का घोर अभाव है। रिपोर्ट में सबसे पहली खामी यह बताई गई है कि यातना की परिभाषा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है — विशेष रूप से मानसिक पीड़ा को कानूनी दायरे से बाहर रखा गया है।
इसके अलावा, सजा के स्पष्ट प्रावधानों की कमी, पीड़ितों के पुनर्वास और मुआवजे की अपर्याप्त व्यवस्था, तथा शिकायत दर्ज करने की पारदर्शी प्रणाली का अभाव भी चिंता के प्रमुख बिंदु हैं। मेडिकल जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले तरीके भी इस्तांबुल प्रोटोकॉल जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाते।
पुलिस एनकाउंटर: एक व्यवस्थित प्रवृत्ति?
रिपोर्ट का सबसे विस्फोटक हिस्सा पंजाब प्रांत में बढ़ते पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा है। मुजफ्फरगढ़ की एक महिला स्वास्थ्यकर्मी ने अपने दो बेटों की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की है, जो न्याय व्यवस्था पर आम नागरिकों के घटते विश्वास का प्रतीक बन गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल के महीनों में पंजाब में सैकड़ों पुलिस मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में मौतें दर्ज की गई हैं। चिंताजनक यह है कि कुछ मामलों में राजनीतिक स्तर पर इन घटनाओं की खुलकर प्रशंसा की गई है, जिससे न्यायेतर हत्याओं को अप्रत्यक्ष वैधता मिलती दिखती है।
यातना को 'प्रभावी तरीका' मानने की सोच
रिपोर्ट एक गहरी सामाजिक-संस्थागत समस्या की ओर भी इशारा करती है। पाकिस्तान में यह धारणा व्यापक रूप से प्रचलित है कि अपराध नियंत्रण के लिए यातना एक कारगर उपकरण है — खासकर तब जब पुलिस बल संसाधनों की कमी से जूझ रहा हो और अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हो।
यह मानसिकता कानून और अव्यवस्था के बीच की रेखा को धुंधला करती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि स्वतंत्र या स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) जांच की सीमित व्यवस्था इस समस्या को और गहरा बनाती है।
गहरा संदर्भ: पाकिस्तान में मानवाधिकार का इतिहास
गौरतलब है कि पाकिस्तान पहले भी ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टों में हिरासत यातना, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं के लिए आलोचना का केंद्र रहा है। 2022 का यातना विरोधी कानून कागज पर एक सकारात्मक कदम था, लेकिन जब तक अभियोजन दर शून्य के करीब रहे और दोषसिद्धि न हो, कानून का कोई अर्थ नहीं।
तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में भी हिरासत यातना की समस्या है, लेकिन पाकिस्तान में राजनीतिक स्तर पर एनकाउंटर की सराहना एक खतरनाक अपवाद है जो संस्थागत जवाबदेही को सीधे कमजोर करता है।
आगे क्या होगा
यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी समिति द्वारा पाकिस्तान की आधिकारिक समीक्षा से पहले प्रस्तुत की गई है। समिति की समीक्षा के बाद पाकिस्तान को ठोस सुधारों की सिफारिशें मिल सकती हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इन सुधारों की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।