वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP वृद्धि दर 6.6% रहने का अनुमान: क्रिसिल रेटिंग्स
सारांश
मुख्य बातें
क्रिसिल रेटिंग्स की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है — जो वित्त वर्ष 2026 की 7.7 प्रतिशत की अपेक्षाकृत मज़बूत वृद्धि से कुछ नरम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की ऊँची कीमतें, कमज़ोर मानसून और बढ़ती महंगाई आने वाले वित्त वर्ष में आर्थिक गति पर दबाव बना सकते हैं।
वित्त वर्ष 2026 में क्यों रही वृद्धि बेहतर
क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में आर्थिक प्रदर्शन अनुमान से बेहतर रहा। इसके पीछे निजी खपत को मिला राजकोषीय समर्थन, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती, अनुकूल मानसून, कम महंगाई (2.1 प्रतिशत) और कच्चे तेल की कम कीमतें जैसे कारक रहे। इसके अलावा, वैश्विक अर्थव्यवस्था की मज़बूत स्थिति ने भी भारत के निर्यात को सहारा दिया।
वित्त वर्ष 2027 में क्या बदल सकता है
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में उपरोक्त कई अनुकूल कारक प्रतिकूल हो सकते हैं। क्रिसिल इंटेलिजेंस के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट के बाद कच्चे तेल की कीमतें पिछले एक दशक के उच्च स्तर पर पहुँच गई हैं और चालू वित्त वर्ष में इनके औसतन 90 से 95 डॉलर प्रति बैरल के बीच बने रहने की संभावना है। ऊर्जा और परिवहन लागत में इस बढ़ोतरी का बोझ उत्पादक अंततः उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं, जिससे कोर महंगाई और बढ़ने की आशंका है।
मानसून और कृषि पर जोखिम
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीज़न में दीर्घकालिक औसत का केवल 90 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान जताया है, जो सामान्य से कम बारिश का संकेत है। रिपोर्ट में यह भी चेताया गया है कि अल नीनो जैसी परिस्थितियों की संभावना कृषि उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है, जिसका सीधा असर ग्रामीण खपत पर पड़ेगा।
महंगाई और खपत पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में महंगाई बढ़कर 5.1 प्रतिशत तक पहुँच सकती है, जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह 2.1 प्रतिशत थी। इससे निजी खपत पर दबाव बढ़ने की आशंका है। गौरतलब है कि निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) की वृद्धि दर पिछली तिमाही के 8.2 प्रतिशत से घटकर 7.1 प्रतिशत रही — हालाँकि यह पिछले 10 तिमाहियों के औसत 6.4 प्रतिशत से अभी भी ऊपर है।
वैश्विक परिदृश्य और निर्यात चुनौती
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि पश्चिम एशिया संघर्ष — जो फरवरी के अंत में शुरू हुआ और मार्च में तेज़ हुआ — के कारण वैश्विक मांग कमज़ोर रहने की संभावना है, जिसका असर भारत के निर्यात पर भी पड़ सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी निर्यात-आधारित विकास रणनीति को मज़बूत करने की कोशिश में है। आने वाले महीनों में इन जोखिमों का प्रबंधन नीति-निर्माताओं के लिए प्रमुख चुनौती होगी।