पीएमएमएसवाई से बदली गिरिडीह के सुमन कुमार की किस्मत: 32 तालाबों से 150 टन मछली, 40 लोगों को रोज़गार
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड के युवा मत्स्य उद्यमी सुमन कुमार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) का लाभ उठाकर अपने गाँव को रोज़गार और मुनाफ़े का केंद्र बना दिया है। उनके 32 तालाबों से अब सालाना 100 से 150 टन मछली का उत्पादन होता है और 30 से 40 स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार मिल रहा है। 8 सितंबर को सामने आई इस सफलता की कहानी सरकारी योजनाओं के ज़मीनी असर का एक ठोस उदाहरण बन रही है।
इज़रायल से पढ़कर लौटे, गाँव में बोया बदलाव का बीज
सुमन कुमार ने इज़रायल से मत्स्य पालन और कृषि विज्ञान की उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद अपने गाँव लौटने का फ़ैसला किया। विदेश में अर्जित आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन के ज्ञान को उन्होंने पीएमएमएसवाई के तहत मिलने वाली सरकारी सहायता के साथ जोड़ा। उन्होंने मत्स्य विभाग के जिला कार्यालय में आवेदन किया और विशेष रूप से हेचरी निर्माण के लिए योजना का लाभ प्राप्त किया।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब झारखंड जैसे राज्यों में ग्रामीण युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सुमन का उदाहरण दर्शाता है कि सही योजना और तकनीक के संयोग से गाँव में ही आजीविका के स्थायी अवसर बनाए जा सकते हैं।
आठ तालाबों से 32 तालाबों तक का सफर
सुमन कुमार ने अपना मत्स्य पालन व्यवसाय महज आठ तालाबों से शुरू किया था। पहले वर्ष में ही इन तालाबों से 45 से 50 टन मछली का उत्पादन हुआ। वैज्ञानिक पद्धति, निरंतर परिश्रम और बेहतर प्रबंधन के बल पर उनका कारोबार आज 32 तालाबों तक विस्तृत हो चुका है।
इन तालाबों में मुख्य रूप से रोहू और कतला समेत अनेक प्रजातियों की मछलियाँ पाली जाती हैं। तैयार मछलियों की आपूर्ति गिरिडीह के अलावा झारखंड के विभिन्न जिलों और बिहार की कई मंडियों में की जाती है, जिससे उनकी पहचान अब राज्य की सीमाओं से भी आगे पहुँच गई है।
मुनाफ़े का गणित: ₹180-200 प्रति किलो, 50-60% लाभ
सुमन कुमार के अनुसार, रोहू और कतला का थोक बाज़ार भाव ₹180 से ₹200 प्रति किलोग्राम तक मिलता है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन करने पर इस कारोबार में 50 से 60 प्रतिशत तक मुनाफ़ा हासिल हो जाता है।
गौरतलब है कि पारंपरिक खेती की तुलना में मत्स्य पालन में यह मार्जिन उल्लेखनीय रूप से अधिक है, जो इसे झारखंड के छोटे किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनाता है।
स्थानीय रोज़गार: 30-40 परिवारों को मिली आजीविका
तालाबों की देखरेख, मछलियों को आहार देने, मछली पकड़ने और परिवहन जैसे कार्यों में 30 से 40 स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार मिल रहा है। यह रोज़गार सृजन बेंगाबाद जैसे दूरदराज़ के प्रखंड में आर्थिक गतिविधि को सीधे प्रोत्साहित कर रहा है।
सुमन कुमार ने कहा, 'पीएमएमएसवाई हमारे लिए बहुत लाभदायक है। यहाँ के डीएफओ और फिशरीज ऑफिसर बहुत मददगार हैं।' उनके अनुसार, इस योजना का लाभ न केवल उन्हें बल्कि आसपास के स्थानीय किसानों को भी मिल रहा है।
आगे की राह
सुमन कुमार का यह मॉडल झारखंड में मत्स्य पालन क्षेत्र की संभावनाओं को रेखांकित करता है। पीएमएमएसवाई के तहत हेचरी निर्माण से शुरू हुई यह यात्रा अब एक बहु-जिला आपूर्ति श्रृंखला में तब्दील हो चुकी है। यदि राज्य के अन्य युवा उद्यमी इस मॉडल को अपनाते हैं, तो झारखंड का मत्स्य पालन क्षेत्र आने वाले वर्षों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत स्तंभ बन सकता है।