डॉ. जितेंद्र सिंह: रोबोटिक्स और एआई से बदलेगी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, निदान से उपचार तक होगा बड़ा बदलाव
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 2 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित सोसाइटी ऑफ रोबोटिक सर्जरी (एसआरएस इंडिया 2026) के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का अगला चरण रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और नैनोसाइंस से संचालित होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि रोबोटिक्स अब केवल सर्जरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में निदान, उपचार और थेरेपी सहित चिकित्सा के लगभग हर क्षेत्र में इसकी निर्णायक भूमिका होगी।
मुख्य घोषणाएँ और दृष्टिकोण
स्वयं एक चिकित्सक और डायबेटोलॉजिस्ट रहे डॉ. सिंह ने सम्मेलन में कहा कि रोबोटिक्स को केवल एक सर्जिकल उपकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में रोबोटिक मेडिसिन, रोबोटिक एंडोक्राइनोलॉजी और रोबोटिक कार्डियोलॉजी जैसे नए विशेषज्ञता-क्षेत्र उभर सकते हैं। उन्होंने एआई से तुलना करते हुए कहा कि जिस तरह एआई आज चिकित्सा की अनेक विशेषज्ञताओं में प्रयुक्त हो रही है, उसी तरह रोबोटिक्स का दायरा भी तेज़ी से विस्तृत होगा।
डॉ. सिंह ने कहा कि दुनिया अब फ्रंटियर टेक्नोलॉजीज के युग में प्रवेश कर रही है, जहाँ एआई, बायोटेक्नोलॉजी, न्यूक्लियर मेडिसिन, नैनोटेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं में आमूल परिवर्तन ला रहे हैं। उनके अनुसार भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था आनुवंशिक जानकारी पर आधारित निदान और व्यक्तिगत उपचार पद्धतियों पर अधिक निर्भर होगी।
प्रिसिजन मेडिसिन और जीनोम इंडिया
मंत्री ने प्रिसिजन मेडिसिन की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि एक ही बीमारी से पीड़ित दो मरीज़ों के लिए उपचार का तरीका अलग हो सकता है, क्योंकि उनका जीन प्रोफाइल, जीवनशैली, खानपान और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। यह विचार उसी व्यक्तिगत अंतर को केंद्र में रखकर विकसित हो रहा है।
उन्होंने जीनोम इंडिया कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए बताया कि इस पहल के तहत अब तक 10,000 लोगों का जीन अनुक्रमण किया जा चुका है। डॉ. सिंह ने उम्मीद जताई कि भविष्य में भारत हर नवजात शिशु के जीन अनुक्रमण की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। गौरतलब है कि 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले देश में इतने बड़े पैमाने पर आनुवंशिक आँकड़ों का विश्लेषण और प्रबंधन केवल एआई और रोबोटिक्स जैसी उन्नत तकनीकों के ज़रिये ही संभव होगा।
नैनोमेडिसिन की संभावनाएँ
डॉ. सिंह ने नैनोमेडिसिन की संभावनाओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र की कई पुरानी चुनौतियों का समाधान नैनो तकनीक के माध्यम से किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि ओरल इंसुलिन विकसित करने के प्रयास जारी हैं और नैनो-स्तरीय तकनीकें दवाओं की डिलीवरी प्रणाली को और अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
उनके अनुसार नैनो तकनीक-आधारित नवाचार न केवल दवाओं के प्रभाव को बेहतर बनाएँगे, बल्कि रोग प्रबंधन और उपचार के नए रास्ते भी खोलेंगे। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक स्वास्थ्य-तकनीक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है।
आम जनता और स्वास्थ्य तंत्र पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार यदि ये प्रौद्योगिकियाँ बड़े पैमाने पर लागू होती हैं, तो ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में भी उच्च-गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना संभव हो सकता है। रोगों की प्रारंभिक पहचान, जोखिम मूल्यांकन और व्यक्तिगत उपचार रणनीतियाँ मरीज़ों के लिए बेहतर परिणाम सुनिश्चित कर सकती हैं।
आने वाले वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान और नीति-निर्माण का केंद्र-बिंदु इन्हीं फ्रंटियर तकनीकों के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर टिका होगा।