एआई और एग्री-स्टार्टअप्स से बदलेगी भारत की कृषि अर्थव्यवस्था, किसानों को ₹5,000 सालाना बचत: डॉ. जितेंद्र सिंह
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 8 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित तकनीक और विज्ञान-संचालित एग्री-स्टार्टअप्स भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा बदलने की क्षमता रखते हैं। उनके अनुसार, इन तकनीकों के व्यापक उपयोग से खेती की उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों की आय में सुधार होगा और ग्रामीण युवाओं के लिए रोज़गार के नए द्वार खुलेंगे। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को साकार करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीक, नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहन देना अनिवार्य है।
स्टार्टअप क्रांति का अगला पड़ाव: कृषि
डॉ. सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम असाधारण गति से फला-फूला है। वर्ष 2015 में जहाँ देश में मात्र लगभग 350 पंजीकृत स्टार्टअप थे, वहीं आज यह संख्या बढ़कर 2.3 लाख से अधिक हो चुकी है। इसी के साथ भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टार्टअप क्रांति का अगला और निर्णायक चरण कृषि क्षेत्र से जुड़ा होना चाहिए। उनके अनुसार, यह धारणा बदलने की ज़रूरत है कि स्टार्टअप केवल सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) या महानगरों तक सीमित हैं — वास्तव में कृषि आज उद्यमिता के सबसे बड़े अवसरों में से एक है।
एआई से किसानों को ₹5,000 सालाना बचत, अर्थव्यवस्था में ₹70,000 करोड़ का अतिरिक्त मूल्य
कृषि में एआई की भूमिका को विस्तार से समझाते हुए मंत्री ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब फसल-पूर्वानुमान प्रबंधन, सटीक सिंचाई (प्रिसिजन इरिगेशन), मौसम-आधारित कृषि सलाह और संसाधनों के कुशल उपयोग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने उपलब्ध अनुमानों का हवाला देते हुए कहा कि केवल एआई-आधारित बेहतर प्रबंधन से प्रत्येक किसान प्रतिवर्ष लगभग ₹5,000 की बचत कर सकता है, जिससे देश की कृषि अर्थव्यवस्था में कुल मिलाकर करीब ₹70,000 करोड़ का अतिरिक्त मूल्य जुड़ सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि सैटेलाइट तकनीक, उन्नत मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण, संसाधन मैपिंग और रियल-टाइम कृषि सलाह जैसी वैज्ञानिक प्रगति किसानों को बुआई, सिंचाई और फसल प्रबंधन में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बना रही है। बेहतर मौसम पूर्वानुमान से किसान बदलते मानसून के अनुरूप सही फसल चुन सकते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती और विज्ञान का जवाब
डॉ. सिंह ने जलवायु परिवर्तन को वैश्विक कृषि के समक्ष सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय जलवायु-अनुकूल फसलों, जीनोमिक्स, फसल सुधार, कीट-प्रतिरोधी किस्मों, प्रिसिजन फार्मिंग और संसाधनों के इष्टतम उपयोग जैसे क्षेत्रों में व्यापक शोध को सक्रिय रूप से समर्थन दे रहा है। उनके अनुसार, इन प्रयासों से भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, मज़बूत और उत्पादक बनाया जा सकेगा।
व्यावहारिक ज्ञान और डिजिटल शिक्षा की अहमियत
मंत्री ने यह भी कहा कि कई बार औपचारिक शैक्षणिक योग्यता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण व्यावहारिक ज्ञान, नवाचार की सोच और सीखने की ललक होती है। सरकारी सहयोग, वैज्ञानिक संस्थानों की भागीदारी और डिजिटल लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म की मदद से आधुनिक कृषि तकनीकें अब ग्रामीण क्षेत्रों तक तेज़ी से पहुँच रही हैं। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण युवाओं में उद्यमिता की आकांक्षा तेज़ी से बढ़ रही है और सरकार उसे एग्री-टेक की दिशा में मोड़ना चाहती है।