जैव-अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक छलांग: 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य, जितेंद्र सिंह का बड़ा ऐलान
सारांश
Key Takeaways
- डॉ. जितेंद्र सिंह ने 24 अप्रैल 2025 को IIT रुड़की में घोषणा की कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचेगी।
- भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 में 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 165 अरब डॉलर से अधिक हो चुकी है — 18%25 वार्षिक वृद्धि दर के साथ।
- 2030 तक 300 अरब डॉलर का मध्यवर्ती लक्ष्य निर्धारित है।
- बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या 50 से बढ़कर 11,000 से अधिक हो गई है।
- ANRF (50,000 करोड़ रुपए) और RDI कोष (1 लाख करोड़ रुपए) गहन तकनीकी नवाचार को वित्त पोषित करेंगे।
- प्रमुख उपलब्धियों में जीनोम इंडिया, स्वदेशी CAR-T थेरेपी, mRNA वैक्सीन प्लेटफॉर्म और पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक शामिल हैं।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शुक्रवार, 24 अप्रैल 2025 को घोषणा की कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-Economy) वर्ष 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को छू लेगी, जिससे भारत दुनिया की शीर्ष तीन जैव-अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह पक्की कर लेगा। यह बयान उन्होंने आईआईटी रुड़की में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दिया।
2014 से 2025 तक: एक दशक में 16 गुना वृद्धि
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 में मात्र 10 अरब डॉलर थी, जो आज बढ़कर 165 अरब डॉलर से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि लगभग 18 प्रतिशत वार्षिक दर से हो रही है, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। सरकार का अगला लक्ष्य 2030 तक 300 अरब डॉलर का आंकड़ा पार करना है।
इस एक दशक की यात्रा को ऐतिहासिक इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स की संख्या इसी अवधि में लगभग 50 से बढ़कर 11,000 से अधिक हो गई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के आधिकारिक बयान में यह आंकड़े साझा किए गए।
21वीं सदी होगी 'भारत की सदी': जितेंद्र सिंह
मंत्री ने सम्मेलन में कहा कि जीव विज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था से संचालित यह इक्कीसवीं सदी वास्तव में 'भारत की सदी' साबित होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि नीतिगत सुधारों, मजबूत संस्थागत ढांचों और तेजी से पनप रहे नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की बदौलत भारत जीन से क्यूबिट तक और समुद्र की गहराइयों से अंतरिक्ष तक पूर्ण तकनीकी क्षमता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ जैव-अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आधिपत्य स्थापित करने की होड़ में हैं। भारत का इस दौड़ में तेज़ी से शामिल होना वैश्विक रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन और अनुसंधान कोष
उभरती प्रौद्योगिकियों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय क्वांटम मिशन ने निर्धारित समय से पहले ही कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर पार कर लिए हैं। भारत ने कई प्रमुख तकनीकी क्षेत्रों में वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष स्थान भी हासिल किए हैं।
मंत्री ने 50,000 करोड़ रुपए के कोष वाले अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) और 1 लाख करोड़ रुपए के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष का विशेष उल्लेख किया। इन दोनों कोषों का उद्देश्य गहन तकनीकी नवाचार के लिए दीर्घकालिक और कम लागत वाला वित्तपोषण सुनिश्चित करना है।
वैज्ञानिक उपलब्धियां: जीनोम से लेकर एंटीबायोटिक तक
डॉ. जितेंद्र सिंह ने हालिया वर्षों में हासिल की गई कई बड़ी वैज्ञानिक सफलताओं को भी रेखांकित किया। इनमें जीनोम इंडिया परियोजना के तहत हुई प्रगति, स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी का विकास, mRNA वैक्सीन प्लेटफॉर्म की स्थापना और भारत की पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक दवा का निर्माण प्रमुख रूप से शामिल हैं।
गौरतलब है कि CAR-T सेल थेरेपी जैसी तकनीकें पहले केवल पश्चिमी देशों तक सीमित थीं और इनकी लागत आम भारतीय की पहुंच से बाहर थी। भारत में इसके स्वदेशी विकास से न केवल लागत घटेगी बल्कि कैंसर उपचार लाखों मरीजों तक सुलभ होगा।
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर असर
जैव-अर्थव्यवस्था की यह वृद्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। 11,000 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप्स का मतलब है लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार। mRNA वैक्सीन और जीनोमिक्स जैसी तकनीकें भविष्य की महामारियों से निपटने में भारत को आत्मनिर्भर बनाएंगी।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो अमेरिका की जैव-अर्थव्यवस्था लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर और चीन की लगभग 500 अरब डॉलर के आसपास है। भारत यदि 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य हासिल कर लेता है तो यह एशिया में चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी जैव-अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
आने वाले वर्षों में ANRF और RDI कोष से वित्त पोषित परियोजनाओं के परिणाम सामने आने शुरू होंगे। 2030 का 300 अरब डॉलर का लक्ष्य इस दिशा में पहली बड़ी कसौटी होगी, जिस पर सरकार की नीतियों की सफलता या विफलता का आकलन किया जाएगा।