रुपया डॉलर के मुकाबले 94.50 तक जा सकता है, पूंजी प्रवाह के लिए संरचनात्मक सुधार जरूरी: SBI रिसर्च
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रुपया निकट भविष्य में डॉलर के मुकाबले 94.50 के स्तर तक पहुँच सकता है, बशर्ते विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बना रहे। SBI रिसर्च की 12 अक्टूबर 2026 को जारी रिपोर्ट में यह आकलन करते हुए यह भी कहा गया है कि देश में पूंजी प्रवाह को टिकाऊ बनाने के लिए सरकार को संरचनात्मक उपायों पर ध्यान देना होगा।
बीओपी अधिशेष और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स (BOP) अधिशेष घटकर लगभग 55-60 अरब डॉलर रह सकता है। हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सबसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त है।
आरबीआई के मौद्रिक और नियामक कदम
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने रुपए को सहारा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। रुपए की तरलता घटाने से उसकी आपूर्ति सीमित होगी, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फेसिलिटी (MSF) दर में बढ़ोतरी से रुपए की ऊपरी मूल्य-सीमा मजबूत होगी। ये उपाय अल्पावधि में रुपए की कीमत को स्थिर रखने में सहायक माने जा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, RBI ने सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक अलग डॉलर-आपूर्ति विंडो खोली है, जिससे प्रति माह लगभग 10-12 अरब डॉलर खुले स्पॉट बाज़ार से हटकर इस विंडो के माध्यम से आएंगे। साथ ही, दैनिक कैश रिज़र्व रेश्यो (CRR) अनुपालन को बढ़ाकर 99 प्रतिशत कर दिया गया है और ₹25,000 करोड़ के ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) बिक्री का भी ऐलान किया गया है।
हेजिंग दुरुपयोग पर सख्ती
RBI ने विदेशी मुद्रा हेजिंग सुविधाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया को कड़ा किया है। केंद्रीय बैंक के निर्देश के अनुसार, 'अधिकृत डीलरों को उन उपयोगकर्ताओं से एक अंडरटेकिंग लेनी होगी और उसे अपने पास सुरक्षित रखना होगा जो भारतीय रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट करते हैं। इस अंडरटेकिंग में यह पुष्टि होनी चाहिए कि उसी अंडरलाइंग एक्सपोजर के लिए किसी अन्य अधिकृत डीलर के साथ हेजिंग नहीं की गई है।' इसके साथ ही, विदेशी मुद्रा बाज़ार की सुचारू कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए RBI ने रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की पुनर्बुकिंग पर भी पाबंदियाँ लगाई हैं।
संरचनात्मक सुधारों की दरकार
रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मौद्रिक उपाय अल्पकालिक राहत दे सकते हैं, परंतु दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के लिए राजकोषीय और कर नीतियों में भी ठोस बदलाव आवश्यक हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अनिश्चितता के बीच उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी-पलायन का जोखिम बना हुआ है।
आगे की संभावनाएँ
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि RBI की नीतिगत पहलों के साथ-साथ सरकार भी निवेशक-अनुकूल राजकोषीय उपाय करती है, तो रुपए की स्थिति और मजबूत हो सकती है। गौरतलब है कि वैश्विक बाज़ारों में डॉलर की चाल और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के भविष्य के निर्णय भी रुपए की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।