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आशा पारेख: ₹11 की साइनिंग और 'स्टार मैटीरियल नहीं' के दर्द से दादा साहेब फाल्के तक का सफर

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आशा पारेख: ₹11 की साइनिंग और 'स्टार मैटीरियल नहीं' के दर्द से दादा साहेब फाल्के तक का सफर

सारांश

₹11 की साइनिंग, 'स्टार मैटीरियल नहीं' का दंश — और फिर दादा साहेब फाल्के पुरस्कार तक का सफर। आशा पारेख की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की है जिसने हिंदी सिनेमा को उसकी जड़ें और उसका गौरव दिया।

मुख्य बातें

आशा पारेख का जन्म 2 अक्टूबर 1942 को मुंबई के सांता क्रूज़ में हुआ था।
फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' में ₹11 साइनिंग अमाउंट मिलने के बावजूद उन्हें 'स्टार मैटीरियल नहीं' कहकर हटाया गया।
1959 में 'दिल देके देखो' से बतौर हीरोइन स्थायी पहचान मिली; 'कटी पतंग' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला।
1998–2001 तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की पहली महिला अध्यक्ष रहीं।
1992 में पद्म श्री , 2002 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2020 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित।

हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख का जन्म 2 अक्टूबर 1942 को मुंबई के सांता क्रूज़ में हुआ था। उनकी कहानी महज़ एक अभिनेत्री के उभरने की नहीं, बल्कि उस जिजीविषा की है जो रिजेक्शन की राख से फ़ीनिक्स की तरह उठती है — और अंततः केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की पहली महिला अध्यक्ष और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार विजेता के रूप में इतिहास रचती है।

बचपन में डांस, परदे पर पहली दस्तक

आशा पारेख को बचपन से ही नृत्य का गहरा लगाव था। मात्र आठ वर्ष की आयु में उन्होंने स्कूल के एक कार्यक्रम में प्रस्तुति दी, जिसके लिए उन्होंने कथक और भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया था। उसी प्रदर्शन से प्रभावित होकर著名 निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें मंच पर देखा और फ़िल्म 'बाप बेटी' में बाल कलाकार के रूप में काम दिया। इससे पहले वह 'मां', 'आसमान' और 'श्री चैतन्य महाप्रभु' जैसी फिल्मों में भी बाल कलाकार के रूप में नज़र आ चुकी थीं।

₹11 की साइनिंग और वह दर्दनाक रिजेक्शन

आशा पारेख के करियर का सबसे तकलीफ़देह मोड़ तब आया जब निर्देशक विजय भट्ट की फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' में उन्हें बतौर हीरोइन साइन किया गया। साइनिंग अमाउंट के तौर पर उन्हें महज़ ₹11 मिले थे। कुछ दिनों की शूटिंग के बाद उन्हें फ़िल्म से हटा दिया गया। आशा पारेख ने स्वयं बताया था कि उन्हें कहा गया कि वे 'स्टार मैटीरियल' नहीं हैं। उनकी जगह अभिनेत्री अमीता को लिया गया। यह झटका उस वक्त किसी भी उभरती अभिनेत्री के लिए करियर-अंत करने वाला साबित हो सकता था।

यह ऐसे समय में आया था जब हिंदी फ़िल्म उद्योग में किसी नई लड़की को स्थापित होने के अवसर बेहद सीमित थे। लेकिन इस रिजेक्शन ने आशा पारेख को तोड़ा नहीं — उन्होंने इसे अपने संकल्प की कसौटी बना लिया।

नासिर हुसैन ने बदली तकदीर, 'दिल देके देखो' से मिली पहचान

रिजेक्शन के कुछ ही समय बाद फ़िल्ममेकर नासिर हुसैन ने उन्हें फ़िल्म 'दिल देके देखो' के लिए स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया। 1959 में आई इस फ़िल्म में उनके साथ शम्मी कपूर थे। फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर हिट रही और आशा पारेख को बतौर हीरोइन एक ठोस पहचान मिली। गौरतलब है कि यही वह मोड़ था जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

स्वर्णिम दौर: छह दशकों का सिनेमाई योगदान

1960 और 1970 के दशक में आशा पारेख हिंदी सिनेमा की शीर्ष अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं। 'जब प्यार किसी से होता है', 'तीसरी मंजिल', 'लव इन टोक्यो', 'मेरे सनम', 'उपकार', 'कटी पतंग', 'कारवां' और 'मेरा गांव मेरा देश' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय और नृत्य को दर्शकों ने भरपूर प्यार दिया। 'कटी पतंग' में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार से नवाज़ा गया।

आशा पारेख ने अभिनय तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने निर्माता और निर्देशक के रूप में भी काम किया। वह टेलीविज़न से जुड़ीं और गुजराती धारावाहिक 'ज्योति' का निर्देशन किया। इसके अलावा उन्होंने 'कोरा कागज़' जैसे टीवी प्रोजेक्ट में भी योगदान दिया।

सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष और सर्वोच्च सम्मान

परदे के बाहर भी आशा पारेख की उपलब्धियाँ कम प्रभावशाली नहीं रहीं। वह सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रहीं। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि 1998 से 2001 तक वह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की अध्यक्ष रहीं — और यह पद संभालने वाली वह पहली महिला थीं। पुरस्कारों की बात करें तो 1992 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया, 2002 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला, और भारत सरकार ने उन्हें 2020 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना — जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है।

आशा पारेख की यात्रा यह सिद्ध करती है कि एक रिजेक्शन किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं करता — बशर्ते इरादे अडिग हों।

संपादकीय दृष्टिकोण

नियम नहीं — और तब भी उन्होंने न केवल अभिनय में बल्कि संस्थागत नेतृत्व में भी अपनी जगह बनाई। सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष बनना महज एक पद नहीं था — यह उस उद्योग में प्रतिनिधित्व की एक ऐतिहासिक दरार थी जो परंपरागत रूप से पुरुष-संचालित रहा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उनकी फिल्मों और पुरस्कारों तक सिमट जाती है, लेकिन यह अनदेखा रह जाता है कि उन्होंने एक ऐसी संरचना के भीतर काम किया और उसे बदला जो उन्हें शुरुआत में ही 'अयोग्य' घोषित कर चुकी थी।
RashtraPress
1 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आशा पारेख को 'स्टार मैटीरियल नहीं' किसने कहा और कब?
निर्देशक विजय भट्ट की फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' में बतौर हीरोइन साइन होने के बाद कुछ दिनों की शूटिंग के बाद आशा पारेख को यह कहकर हटाया गया। उन्हें साइनिंग अमाउंट के रूप में केवल ₹11 मिले थे और उनकी जगह अभिनेत्री अमीता को लिया गया।
आशा पारेख की पहली बड़ी हिट फ़िल्म कौन सी थी?
1959 में आई फ़िल्म 'दिल देके देखो' आशा पारेख की पहली बड़ी हिट थी, जिसमें उनके साथ शम्मी कपूर थे। इस फ़िल्म के बाद उन्हें बतौर हीरोइन स्थायी पहचान मिली और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
आशा पारेख को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले हैं?
आशा पारेख को 1992 में पद्म श्री, 2002 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2020 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। इसके अलावा 'कटी पतंग' के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार भी मिला।
आशा पारेख सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष कब बनीं और यह क्यों खास था?
आशा पारेख 1998 से 2001 तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की अध्यक्ष रहीं और यह पद संभालने वाली वह पहली महिला थीं। यह नियुक्ति भारतीय फ़िल्म उद्योग के प्रशासनिक ढाँचे में महिला नेतृत्व की ऐतिहासिक उपस्थिति का प्रतीक बनी।
आशा पारेख ने फ़िल्मों के अलावा और क्या काम किया?
आशा पारेख ने अभिनय के अलावा निर्माता और निर्देशक के रूप में भी काम किया। उन्होंने गुजराती धारावाहिक 'ज्योति' का निर्देशन किया और 'कोरा कागज़' जैसे टीवी प्रोजेक्ट से जुड़ीं। वह सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष भी रहीं।
राष्ट्र प्रेस
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