जब पत्नी ने गहने गिरवी रखे और दादासाहेब फाल्के ने जिंदगी दांव पर लगाई, ऐसे रची गई भारतीय सिनेमा की कहानी
सारांश
Key Takeaways
- दादासाहेब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में हुआ था।
- फाल्के ने फिल्म निर्माण सीखने के लिए अपनी बीमा पॉलिसी गिरवी रखी और लंदन गए।
- उनकी पत्नी सरस्वती फाल्के ने अपने गहने बेचकर पहली फिल्म के निर्माण में सहायता की।
- 'राजा हरिश्चंद्र' 1913 में रिलीज़ हुई और भारत की प्रथम पूर्णकालिक फीचर फिल्म बनी।
- 19 वर्षीय कैरियर में फाल्के ने 95 फीचर फिल्मों और 26 लघु फिल्मों का निर्माण किया।
- 1969 में भारत सरकार ने 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' स्थापित किया, जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है।
मुंबई, 29 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। आज भारतीय सिनेमा विश्व के सर्वाधिक उत्पादक फिल्म उद्योगों में शुमार है, जहाँ प्रतिवर्ष हज़ारों फिल्में निर्मित होती हैं और करोड़ों दर्शक उन्हें देखते हैं। किंतु डेढ़ सदी पूर्व भारत में चलचित्र का कोई अस्तित्व नहीं था। उसी युग में एक व्यक्ति ने एक सुदूर स्वप्न देखा — कि भारत की अपनी फिल्मों, अपनी कथाओं और अपने अभिनेताओं की परंपरा होगी। वह व्यक्ति थे धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें विश्व दादासाहेब फाल्के के नाम से जानता है।
त्याग और जुनून की कहानी
फिल्मों के प्रति उनका आसक्ति इतनी गहन थी कि उन्होंने चलचित्र निर्माण की तकनीक सीखने के लिए अपनी बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी। इसी कठिन समय में उनकी पत्नी सरस्वती फाल्के ने अपने आभूषण बेचकर उनका साथ निभाया। इन्हीं बलिदानों और संघर्षों की बुनियाद पर भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठा रची गई — एक ऐसी विरासत जो आज सौ वर्षों बाद भी जीवंत है।
जीवन का प्रारंभिक दौर
30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में जन्मे दादासाहेब फाल्के के पिता संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान थे। बचपन से ही कला के प्रति फाल्के का अनुराग स्पष्ट था। उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन पूर्ण करने के उपरांत उन्होंने फोटोग्राफी में कार्य किया, बाद में मुद्रण प्रेस भी संचालित किए। किंतु उनका जीवन सुखमय नहीं रहा — व्यापार में हानि और अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
चलचित्र की ओर मुड़ना
उनके जीवन का निर्णायक क्षण तब आया जब उन्होंने एक विदेशी फिल्म 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखी। इस फिल्म ने उनके मन में एक प्रश्न जगाया — यदि पश्चिमी निर्माता अपनी धार्मिक गाथाओं को परदे पर जीवंत कर सकते हैं, तो भारत की 'रामायण' और 'महाभारत' जैसी अनंत कथाएँ क्यों नहीं? यहीं से उन्होंने चलचित्र जगत में प्रवेश का निर्णय किया।
असंभव को संभव बनाना
उस काल में भारत में फिल्म निर्माण लगभग अकल्पनीय माना जाता था। न तो कैमरा-तकनीक का ज्ञान था और न ही निर्माण का व्यावहारिक अनुभव। फाल्के ने स्वयं को इस कला में पारंगत करने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी गिरवी रखी और लंदन गए, जहाँ उन्होंने फिल्म निर्माण की सूक्ष्मताएँ सीखीं और आवश्यक उपकरण खरीदकर भारत लौट आए।
पहली फीचर फिल्म का निर्माण
भारत आने के बाद फाल्के ने अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने की तैयारी शुरू की। लेकिन सबसे बड़ी बाधा वित्त की थी। ऐसी परिस्थिति में सरस्वती फाल्के उनके साथ अटूट रहीं। उन्होंने अपने गहने गिरवी रख दिए ताकि निर्माण कार्य निर्बाध रह सके। केवल इतना ही नहीं — सरस्वती पूरी टीम के लिए भोजन तैयार करती थीं, अभिनेताओं की पोशाकें संभालती थीं और शूटिंग के प्रत्येक चरण में सहायता प्रदान करती थीं। उनका योगदान फाल्के के सपने को साकार करने में अपरिहार्य था।
सिनेमा की नई शुरुआत
1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' प्रदर्शित हुई और यह भारत की प्रथम पूर्णकालिक फीचर फिल्म बन गई। दर्शकों ने इसे भरपूर स्वागत दिया। इसके उपरांत दादासाहेब फाल्के ने अपनी सफलता की यात्रा जारी रखी। उन्होंने 'मोहिनी भस्मासुर', 'सत्यवान सावित्री', 'लंका दहन', 'श्रीकृष्ण जन्म' और 'कालिया मर्दन' जैसी अनेक सफल फिल्मों का निर्माण किया। अपने लगभग 19 वर्षीय कैरियर में उन्होंने 95 फीचर फिल्मों और 26 लघु फिल्मों का निर्माण किया।
परिवर्तन और संध्या
समय के साथ चलचित्र माध्यम भी विकसित हुआ। मूक फिल्मों का स्थान सवाक् फिल्मों ने ले लिया। फाल्के इस तकनीकी परिवर्तन के साथ पूर्ण रूप से आगे नहीं बढ़ पाए। उनकी अंतिम फिल्म 'गंगावतरण' थी, जो 1937 में प्रदर्शित हुई। इसके बाद उन्होंने चलचित्र उद्योग से दूरी बना ली।
विरासत और सम्मान
16 फरवरी 1944 को दादासाहेब फाल्के का निधन हो गया, किंतु भारतीय सिनेमा में उनका अवदान अविनाशी रहेगा। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' की स्थापना की, जिसे भारतीय चलचित्र का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष किसी उत्कृष्ट फिल्मकार को दिया जाता है, जो फाल्के की विरासत को आगे बढ़ाते हैं।