'धुरंधर' की शुरुआत में हुई आलोचना, सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर आयुष्मान खुराना की टिप्पणी
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 12 मई। अभिनेता आयुष्मान खुराना अपनी आने वाली फिल्म 'पति पत्नी और वो दो' को लेकर उत्साहित हैं। फिल्म के प्रचार के दौरान खुराना ने फिल्मों पर सोशल मीडिया के बढ़ते असर पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आजकल किसी भी ट्रेलर या टीजर के रिलीज होते ही दर्शक आलोचना शुरू कर देते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण फिल्में हमेशा दर्शकों का दिल जीत लेती हैं।
धुरंधर का उदाहरण
खुराना ने अभिनेता रणवीर सिंह और निर्देशक आदित्य धर की फिल्म 'धुरंधर' का उदाहरण देते हुए कहा कि इसके पहले लुक और ट्रेलर को शुरुआत में काफी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली थीं। हालांकि, फिल्म रिलीज होने के बाद इसने लाखों दर्शकों का दिल जीत लिया और व्यावसायिक सफलता हासिल की।
करियर में आलोचना का चक्र
खुराना के अनुसार, हर अभिनेता अपने करियर की शुरुआत में एक 'हनीमून पीरियड' से गुजरता है, जहाँ उन्हें सभी का प्यार और स्वीकृति मिलती है। लेकिन कुछ वर्षों के बाद, जब कोई अपने करियर के शिखर पर पहुँचता है, तो आलोचना भी सामने आने लगती है। खुराना ने कहा, ''लोग अंडरडॉग यानी संघर्षरत व्यक्ति का साथ देते हैं। जब आप संघर्ष से पार पा जाते हैं, तो लोग आलोचना करने लगते हैं।''
सोशल मीडिया का बदलता प्रभाव
खुराना ने समझाया कि आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ सभी से समान प्यार नहीं मिल सकता। उन्होंने कहा कि पहले भी आलोचना होती थी, लेकिन सोशल मीडिया के आने से वह सार्वजनिक हो गई है। खुराना के अनुसार, पहले आलोचनात्मक बातें चाय की दुकान, सैलून या कोने में सुनी जाती थीं, लेकिन अब सोशल मीडिया पर खुलकर और व्यापक रूप से चर्चा होती है।
धुरंधर की तारीफ
खुराना ने 'धुरंधर' के बारे में कहा, ''मुझे व्यक्तिगत रूप से इसका ट्रेलर बहुत पसंद आया था, लेकिन उसके आसपास बहुत ज्यादा नकारात्मकता थी। मुझे समझ नहीं आया कि इतनी नकारात्मकता क्यों थी। फिल्म ने वाकई जबरदस्त प्रदर्शन किया है। यह सच में एक शानदार फिल्म है।''
उन्होंने आगे कहा, ''यह एक बेंचमार्क है। इसकी कोई मिसाल नहीं है। अब इस बेंचमार्क को तोड़ना बहुत मुश्किल होगा। अच्छी फिल्ममेकिंग और अच्छी कहानी हमेशा चलती है, चाहे वह '12वीं फेल' जैसी छोटी फिल्म हो या 'धुरंधर' जैसी बड़ी फिल्म।''
क्या मायने रखता है
यह टिप्पणी इंडस्ट्री में एक महत्वपूर्ण बहस को रेखांकित करती है — सोशल मीडिया की तुरंत आलोचना और फिल्म की वास्तविक गुणवत्ता के बीच का अंतराल। खुराना का दृष्टिकोण दर्शाता है कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने फिल्म समीक्षा को लोकतांत्रिक तो किया है, लेकिन साथ ही एल्गोरिदम-चालित नकारात्मकता को भी बढ़ावा दिया है।