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बेगम अख्तर की 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया': जब महफिल में छा गया सन्नाटा

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बेगम अख्तर की 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया': जब महफिल में छा गया सन्नाटा

सारांश

बेगम अख्तर की गजल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' सिर्फ एक गीत नहीं — वह एक ऐसा एहसास है जिसने महफिलों में तालियाँ नहीं, सन्नाटा कमाया। 7 अक्टूबर को उनकी जयंती पर याद करते हैं उस आवाज़ को जो फैजाबाद से उठकर गजल की दुनिया की पहचान बन गई।

मुख्य बातें

बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद में हुआ; असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था।
महज़ 14 साल की उम्र में सार्वजनिक मंचों पर गायकी शुरू; गजल, ठुमरी और दादरा की अप्रतिम फ़नकारा।
गजल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' की धुन उन्होंने मुंबई से लखनऊ की ट्रेन यात्रा में तैयार की; रचनाकार शायर शकील बदायूंनी थे।
1945 में बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से निकाह; माँ के निधन के बाद गायकी से अस्थायी विराम, फिर पति के प्रोत्साहन से वापसी।
अभिनेता नाना पाटेकर ने बताया — एक महफिल में उनकी गजल खत्म होने के बाद श्रोता तालियाँ बजाना भूल गए; बेगम अख्तर ने कहा, 'इसी सन्नाटे के लिए हम जीते हैं।' 30 अक्टूबर 1974 को निधन; पाँच दशकों बाद भी उनकी गजलें संगीत-प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं।

'मल्लिका-ए-गजल' बेगम अख्तर की आवाज़ उन विरल आवाज़ों में शुमार है जो कानों से गुज़रकर सीधे रूह को छू जाती थीं — और उनकी कालजयी गजल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' आज भी इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद में जन्मी इस फ़नकारा की बरसी की पूर्व संध्या पर उनके संगीत-सफ़र को याद करना महज़ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक स्वर्णिम अध्याय को दोबारा जीना है।

फैजाबाद से 'मल्लिका-ए-गजल' तक का सफ़र

बेगम अख्तर का असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था। बचपन से संगीत की ओर खिंचाव इतना गहरा था कि महज़ 14 साल की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। गजल, ठुमरी और दादरा — तीनों विधाओं में उनकी पकड़ इतनी पुख्ता थी कि उन्हें जल्द ही इन विधाओं का पर्याय माना जाने लगा। उनकी गायकी में मोहब्बत की मिठास और जुदाई का दर्द एक साथ घुले-मिले होते थे, जो सुनने वाले को अपने ही अनुभवों से जोड़ देते थे।

वह गजल जो ट्रेन में पैदा हुई

बेगम अख्तर की पहचान से अटूट रूप से जुड़ी गजल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' की रचना-कथा उतनी ही दिलचस्प है जितनी खुद गजल। कहा जाता है कि जब वह मुंबई से लखनऊ लौट रही थीं, तब रास्ते में एक शायर ने उनसे मुलाकात की और अपनी लिखी शायरी का एक कागज़ का टुकड़ा उन्हें सौंपा। बेगम अख्तर ने उसे संभालकर अपने पर्स में रख लिया।

जब ट्रेन भोपाल के आसपास पहुँची तो अचानक उस शायरी का ख़याल आया। उन्होंने हारमोनियम निकाला और शब्दों के लिए सुर तलाशने लगीं। धीरे-धीरे धुन तैयार हुई — और यही रचना उस गजल में तब्दील हो गई जो आज भी सुनने वालों को भावुक कर देती है। उस गजल के अंत में आने वाला तखल्लुस 'शकील' बताता है कि इसके रचनाकार मशहूर शायर शकील बदायूंनी थे। बेगम अख्तर ने उनके शब्दों को अपनी आवाज़ देकर एक नई ज़िंदगी दी।

वह सन्नाटा जिसके लिए फ़नकार जीते हैं

फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने बेगम अख्तर के एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए बताया था कि जब उन्होंने गजल खत्म की तो महफिल में तालियाँ नहीं गूंजीं — पूरा माहौल सन्नाटे में डूब गया। आमतौर पर उनकी प्रस्तुति के बाद श्रोता ज़ोरदार तालियों से उनका स्वागत करते थे, लेकिन उस रोज़ हर कोई उसी एहसास में खोया था। जब किसी ने इसकी वजह पूछी तो बेगम अख्तर ने मुस्कुराते हुए कहा — 'इसी सन्नाटे के लिए हम जीते हैं। सामने वाला भूल गया कि उसे ताली भी बजानी है।' यह एक जुमला नहीं, एक फलसफा था — जो उनकी पूरी गायकी का सार था।

निजी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव

1945 में बेगम अख्तर ने बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से निकाह किया। माँ के निधन के बाद वह गहरे सदमे में चली गईं और कुछ समय के लिए गायकी से दूर हो गईं। पति के प्रोत्साहन और हौसले से उन्होंने संगीत में वापसी की — और जब लौटीं तो उनकी आवाज़ में पहले से कहीं अधिक गहराई आ गई थी। यह गहराई तजुर्बे और दर्द से पैदा हुई थी, जो उनकी गजलों में साफ़ झलकती थी।

विरासत जो आज भी जीवित है

30 अक्टूबर 1974 को बेगम अख्तर ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी उतनी ही ज़िंदा है। नए संगीत प्रेमी उन्हें खोज-खोजकर सुनते हैं, और पुरानी पीढ़ी उनकी गजलों में अपना बीता वक्त तलाशती है। गौरतलब है कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ऐसे गायक विरले ही होते हैं जिनकी रचनाएँ पाँच दशकों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक बनी रहती हों — बेगम अख्तर उन चंद नामों में से एक हैं। उनकी बरसी हर साल संगीत-प्रेमियों को उस आवाज़ की याद दिलाती है जो शब्दों को दिल की ज़बान देना जानती थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तजुर्बे की भाषा थी — और श्रोता 'वायरल' नहीं, 'मौन' होकर श्रद्धा देते थे। आज जब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को 'अनडिस्कवर्ड' कहकर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर नए दर्शकों तक पहुँचाया जा रहा है, तब बेगम अख्तर जैसे नामों की पुनर्खोज महज़ नॉस्टेल्जिया नहीं — यह उस कमी को भरने की कोशिश है जो आधुनिक पॉप संगीत छोड़ जाता है। मुख्यधारा की कवरेज उन्हें अक्सर 'किंवदंती' कहकर संतुष्ट हो जाती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम उनकी परंपरा को अगली पीढ़ी तक उतनी ही गहराई से पहुँचा पा रहे हैं जितनी गहराई से उन्होंने शकील बदायूंनी के शब्दों को आवाज़ दी थी।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेगम अख्तर को 'मल्लिका-ए-गजल' क्यों कहा जाता है?
बेगम अख्तर को 'मल्लिका-ए-गजल' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने गजल, ठुमरी और दादरा विधाओं में असाधारण महारत हासिल की और अपनी आवाज़ से शायरी को एक नई जीवंतता दी। उनकी गायकी में भावनात्मक गहराई ऐसी थी कि श्रोता महज़ सुनने वाले नहीं, उस एहसास को जीने वाले बन जाते थे।
'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' गजल किसने लिखी थी?
यह गजल मशहूर शायर शकील बदायूंनी ने लिखी थी। बेगम अख्तर ने इसकी धुन मुंबई से लखनऊ की ट्रेन यात्रा के दौरान भोपाल के पास तैयार की थी, जब उन्हें रास्ते में एक शायर ने यह शायरी कागज़ पर सौंपी थी।
बेगम अख्तर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद (अब अयोध्या, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था और उन्होंने महज़ 14 साल की उम्र में सार्वजनिक गायकी शुरू कर दी थी।
नाना पाटेकर ने बेगम अख्तर के बारे में क्या किस्सा सुनाया था?
अभिनेता नाना पाटेकर ने बताया था कि एक कार्यक्रम में बेगम अख्तर की गजल खत्म होने के बाद पूरी महफिल में सन्नाटा छा गया — श्रोता तालियाँ बजाना भूल गए। जब वजह पूछी गई तो बेगम अख्तर ने मुस्कुराकर कहा, 'इसी सन्नाटे के लिए हम जीते हैं — सामने वाला भूल गया कि उसे ताली भी बजानी है।'
बेगम अख्तर का निधन कब हुआ और उनकी विरासत क्या है?
बेगम अख्तर का निधन 30 अक्टूबर 1974 को हुआ। पाँच दशकों से अधिक समय बाद भी उनकी गजलें महफिलों में बजती हैं और नई पीढ़ी के संगीत-प्रेमी उन्हें उतने ही चाव से सुनते हैं — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
राष्ट्र प्रेस
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