मेहदी हसन: साइकिल मैकेनिक से 'शहंशाह-ए-गजल' तक का 10 साल का संघर्ष
सारांश
मुख्य बातें
मेहदी हसन — जिन्हें दुनिया 'शहंशाह-ए-गजल' के नाम से जानती है — का सफर विलासिता के गलियारों से नहीं, बल्कि एक साइकिल की मरम्मत की दुकान से शुरू हुआ था। 1947 के विभाजन के बाद आई आर्थिक तंगी ने उन्हें मजबूर किया कि वे दिन में पसीना बहाएँ और रात में सुर साधें। 13 जून 2012 को कराची में उनके निधन के बाद भी उनकी गजलें और उनका संघर्ष-भरा जीवन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
संगीत की विरासत में जन्म
मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना गाँव में हुआ था। उनका परिवार पीढ़ियों से शास्त्रीय संगीत की परंपरा से जुड़ा था — उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान अपने दौर के प्रतिष्ठित गायक थे। जब मोहल्ले के बच्चे खेल में मशगूल रहते, तब मेहदी घंटों रियाज करते थे।
आठ साल की उम्र से उन्होंने विधिवत संगीत शिक्षा लेनी शुरू की और युवावस्था तक ध्रुपद, ठुमरी और खयाल जैसी गायकी में महारत हासिल कर ली। घर का वातावरण ऐसा था कि संगीत साँसों में घुल गया था।
विभाजन और संघर्ष का दौर
1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन ने उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया। अपना घर और जड़ें छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा, जहाँ परिवार गंभीर आर्थिक संकट में फँस गया। परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी कंधों पर आई तो उन्होंने एक साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया। बाद में उन्होंने कार और ट्रैक्टर की मरम्मत का काम भी किया।
दिनभर की कठोर मेहनत के बाद रात को वे संगीत का अभ्यास करते थे। गरीबी और थकान ने उनके सपने को कभी नहीं तोड़ा — यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक है।
रेडियो पाकिस्तान और पहचान की शुरुआत
करीब दस साल के अथक संघर्ष के बाद 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का अवसर मिला। शुरुआत में ठुमरी से की गई उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। धीरे-धीरे उन्होंने गजल गायकी की ओर रुख किया और उनकी अनूठी शैली ने उन्हें दोनों देशों में लोकप्रिय बना दिया।
'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामाँ हो गए' और 'अब के हम बिछड़े' जैसी गजलें आज भी संगीत-प्रेमियों की पहली पसंद हैं। महान गायिका लता मंगेशकर ने कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं।
सम्मान और विरासत
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस', 'तमगा-ए-इम्तियाज', 'हिलाल-ए-इम्तियाज' और 'निशान-ए-इम्तियाज' जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा। भारत में उन्हें 1979 में के.एल. सहगल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिण बाहु सम्मान प्रदान किया।
मेहदी हसन ने दो विवाह किए और उनका बड़ा परिवार था। उनके कई बच्चों ने भी संगीत को ही अपना करियर चुना। जीवन के अंतिम वर्षों में लंबी बीमारी के बावजूद संगीत से उनका नाता कभी नहीं टूटा। 13 जून 2012 को कराची में उनका निधन हुआ — लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जीवित है।