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मेहदी हसन: साइकिल मैकेनिक से 'शहंशाह-ए-गजल' तक का 10 साल का संघर्ष

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मेहदी हसन: साइकिल मैकेनिक से 'शहंशाह-ए-गजल' तक का 10 साल का संघर्ष

सारांश

साइकिल की दुकान से 'शहंशाह-ए-गजल' तक — मेहदी हसन की कहानी सिर्फ संगीत की नहीं, उस जिद की है जो 1947 के विभाजन की तबाही और दस साल की गरीबी भी नहीं तोड़ सकी। उनकी विरासत आज भी दो देशों की सरहदें पार करती है।

मुख्य बातें

मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना गाँव में हुआ था।
1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान में आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने साइकिल, कार और ट्रैक्टर मैकेनिक का काम किया।
करीब 10 साल के संघर्ष के बाद 1957 में रेडियो पाकिस्तान पर गाने का मौका मिला और उन्हें पहचान मिली।
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें निशान-ए-इम्तियाज सहित चार प्रतिष्ठित पुरस्कार दिए; भारत में 1979 में के.एल.
महान गायिका लता मंगेशकर ने कहा था — 'मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं।' 13 जून 2012 को कराची में उनका निधन हुआ।

मेहदी हसन — जिन्हें दुनिया 'शहंशाह-ए-गजल' के नाम से जानती है — का सफर विलासिता के गलियारों से नहीं, बल्कि एक साइकिल की मरम्मत की दुकान से शुरू हुआ था। 1947 के विभाजन के बाद आई आर्थिक तंगी ने उन्हें मजबूर किया कि वे दिन में पसीना बहाएँ और रात में सुर साधें। 13 जून 2012 को कराची में उनके निधन के बाद भी उनकी गजलें और उनका संघर्ष-भरा जीवन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।

संगीत की विरासत में जन्म

मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना गाँव में हुआ था। उनका परिवार पीढ़ियों से शास्त्रीय संगीत की परंपरा से जुड़ा था — उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान अपने दौर के प्रतिष्ठित गायक थे। जब मोहल्ले के बच्चे खेल में मशगूल रहते, तब मेहदी घंटों रियाज करते थे।

आठ साल की उम्र से उन्होंने विधिवत संगीत शिक्षा लेनी शुरू की और युवावस्था तक ध्रुपद, ठुमरी और खयाल जैसी गायकी में महारत हासिल कर ली। घर का वातावरण ऐसा था कि संगीत साँसों में घुल गया था।

विभाजन और संघर्ष का दौर

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन ने उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया। अपना घर और जड़ें छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा, जहाँ परिवार गंभीर आर्थिक संकट में फँस गया। परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी कंधों पर आई तो उन्होंने एक साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया। बाद में उन्होंने कार और ट्रैक्टर की मरम्मत का काम भी किया।

दिनभर की कठोर मेहनत के बाद रात को वे संगीत का अभ्यास करते थे। गरीबी और थकान ने उनके सपने को कभी नहीं तोड़ा — यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक है।

रेडियो पाकिस्तान और पहचान की शुरुआत

करीब दस साल के अथक संघर्ष के बाद 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का अवसर मिला। शुरुआत में ठुमरी से की गई उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। धीरे-धीरे उन्होंने गजल गायकी की ओर रुख किया और उनकी अनूठी शैली ने उन्हें दोनों देशों में लोकप्रिय बना दिया।

'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामाँ हो गए' और 'अब के हम बिछड़े' जैसी गजलें आज भी संगीत-प्रेमियों की पहली पसंद हैं। महान गायिका लता मंगेशकर ने कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं।

सम्मान और विरासत

पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस', 'तमगा-ए-इम्तियाज', 'हिलाल-ए-इम्तियाज' और 'निशान-ए-इम्तियाज' जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा। भारत में उन्हें 1979 में के.एल. सहगल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिण बाहु सम्मान प्रदान किया।

मेहदी हसन ने दो विवाह किए और उनका बड़ा परिवार था। उनके कई बच्चों ने भी संगीत को ही अपना करियर चुना। जीवन के अंतिम वर्षों में लंबी बीमारी के बावजूद संगीत से उनका नाता कभी नहीं टूटा। 13 जून 2012 को कराची में उनका निधन हुआ — लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जीवित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

दोनों देशों ने उन्हें सम्मानित किया — जो संगीत की उस सार्वभौमिक शक्ति का प्रमाण है जिसे सीमाएँ नहीं बाँध सकतीं। उनके संघर्ष का सबसे अनदेखा पहलू यह है कि उन्होंने कला को जीविका के साथ संतुलित किया — एक ऐसी चुनौती जिसका सामना आज भी असंख्य कलाकार करते हैं। उनकी विरासत सिर्फ गजलों में नहीं, बल्कि इस सिद्धांत में भी है कि प्रतिभा और परिश्रम मिलकर किसी भी परिस्थिति को पार कर सकते हैं।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेहदी हसन को 'शहंशाह-ए-गजल' का खिताब कैसे मिला?
मेहदी हसन को यह खिताब उनकी बेमिसाल गजल गायकी की वजह से मिला, जिसने भारत और पाकिस्तान दोनों में करोड़ों श्रोताओं का दिल जीता। 1957 में रेडियो पाकिस्तान से शुरू हुई उनकी यात्रा ने उन्हें उपमहाद्वीप का सबसे प्रतिष्ठित गजल गायक बना दिया।
मेहदी हसन ने साइकिल मैकेनिक का काम क्यों किया?
1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद मेहदी हसन का परिवार गंभीर आर्थिक संकट में पड़ गया था। परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने साइकिल मैकेनिक, और बाद में कार व ट्रैक्टर मरम्मत का काम भी किया।
मेहदी हसन की सबसे प्रसिद्ध गजलें कौन-सी हैं?
'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामाँ हो गए' और 'अब के हम बिछड़े' उनकी सबसे लोकप्रिय गजलों में शामिल हैं। ये गजलें आज भी भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में समान रूप से पसंद की जाती हैं।
मेहदी हसन को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस', 'तमगा-ए-इम्तियाज', 'हिलाल-ए-इम्तियाज' और 'निशान-ए-इम्तियाज' से सम्मानित किया। भारत में 1979 में उन्हें के.एल. सहगल पुरस्कार और नेपाल सरकार ने गोरखा दक्षिण बाहु सम्मान प्रदान किया।
मेहदी हसन का निधन कब और कहाँ हुआ?
मेहदी हसन का निधन 13 जून 2012 को कराची, पाकिस्तान में हुआ। जीवन के अंतिम वर्षों में वे लंबे समय तक बीमार रहे, लेकिन संगीत से उनका जुड़ाव अंत तक बना रहा।
राष्ट्र प्रेस
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