देवेन वर्मा की 87वीं जयंती: ₹600 की पहली सैलरी से तीन फिल्मफेयर तक का सफर
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के मशहूर हास्य अभिनेता देवेन वर्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1937 को हुआ था। उनकी कॉमेडी और बेजोड़ टाइमिंग ने पाँच दशकों तक दर्शकों को हँसाया। खास बात यह है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी एंट्री न किसी बड़े ऑडिशन से हुई, न किसी फिल्मी परिवार की पहुँच से — बल्कि एक कॉलेज के नाटक में उनकी परफॉर्मेंस देखकर दिग्गज फिल्ममेकर बी.आर. चोपड़ा ने उन्हें पहला मौका दिया था, और उनकी पहली मासिक सैलरी महज ₹600 थी।
कॉलेज के मंच से फिल्मी दुनिया तक
देवेन वर्मा ने पुणे के नॉरोजी वाडिया कॉलेज से राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी रुचि नाटकों और स्टेज परफॉर्मेंस में गहरी हो गई। वह यूथ फेस्टिवल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और कॉलेज के ड्रामा ग्रुप से भी जुड़े हुए थे। फिल्मी कलाकारों की नकल उतारना उनका पसंदीदा शगल था।
देवेन ने 2013 में दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि एक बार नॉर्थ इंडिया पंजाबी एसोसिएशन के कार्यक्रम में वह एक नाटक पेश कर रहे थे। संयोग से उस कार्यक्रम में बी.आर. चोपड़ा भी मौजूद थे। उनकी परफॉर्मेंस से प्रभावित होकर चोपड़ा ने उन्हें अपनी आने वाली फिल्म 'धर्मपुत्र' में काम का प्रस्ताव दिया, जिसके लिए देवेन को हर महीने ₹600 का मेहनताना तय हुआ।
पहली फिल्म और शुरुआती संघर्ष
1961 में रिलीज़ हुई 'धर्मपुत्र' से देवेन वर्मा ने सिल्वर स्क्रीन पर कदम रखा, हालाँकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता नहीं दिला सकी। इसके बाद वह कुछ समय के लिए विदेश में स्टेज शो करने निकल गए। वापसी के बाद उन्हें एवीएम स्टूडियो के साथ करीब तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने और अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने का अवसर मिला।
1963 में आई 'गुमराह' में उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार के नौकर की कॉमिक भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके बाद 'आज और कल', 'अनुपमा' और 'कहीं और चल' जैसी फिल्मों में भी उनकी उपस्थिति रही।
करियर का शिखर और तीन फिल्मफेयर पुरस्कार
देवेन वर्मा को व्यापक पहचान दिलाने में 1975 की फिल्म 'चोरी मेरा काम' ने अहम भूमिका निभाई। इस फिल्म में उनके कॉमिक अंदाज़ को दर्शकों और आलोचकों दोनों ने सराहा, और उन्हें 1976 में फिल्मफेयर बेस्ट कॉमेडियन अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके बाद उन्होंने 1979 में 'चोर के घर चोर' और 1983 में 'अंगूर' के लिए भी यही पुरस्कार जीता — यानी कुल तीन बार यह सम्मान उनके हिस्से आया।
गौरतलब है कि 'अंगूर' में उनका अभिनय आज भी हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ कॉमिक प्रदर्शनों में गिना जाता है। इसके अलावा 'गोलमाल', 'खट्टा मीठा', 'बुद्धा मिल गया', 'रंग बिरंगी', 'नास्तिक' और 'अंदाज़ अपना अपना' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने यादगार भूमिकाएँ निभाईं।
अभिनेता से निर्माता-निर्देशक तक
देवेन वर्मा केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहे। 1969 में आई फिल्म 'यकीन' के ज़रिए उन्होंने फिल्म निर्माण की दुनिया में कदम रखा। इसके अलावा उन्होंने 'बेशर्म' जैसी फिल्म का निर्देशन भी किया। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में कॉमेडियन का दायरा अक्सर सहायक भूमिकाओं तक सीमित माना जाता था — देवेन ने उस धारणा को तोड़ा।
विरासत और निधन
2 दिसंबर 2014 को पुणे में देवेन वर्मा का निधन हो गया। रिपोर्टों के अनुसार, किडनी फेल होने के कारण उनका निधन हुआ। उनकी मृत्यु के साथ हिंदी सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खोया, जिसने बिना किसी गॉडफादर के अपनी प्रतिभा के दम पर इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई। उनकी फिल्में आज भी क्लासिक कॉमेडी सिनेमा का अभिन्न हिस्सा हैं।