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दिव्या दत्ता का खुलासा: 'लास्ट मैन इन टावर' के बीच सीनियर्स ने सिखाईं अभिनय की बारीकियां

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दिव्या दत्ता का खुलासा: 'लास्ट मैन इन टावर' के बीच सीनियर्स ने सिखाईं अभिनय की बारीकियां

सारांश

दिव्या दत्ता ने 'लास्ट मैन इन टावर' के प्रमोशन के दौरान वह दौर याद किया जब उनके सीनियर्स ने बताया कि अच्छा करने और स्क्रीन पर सही दिखने में फर्क होता है। यही सीख उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनी।

मुख्य बातें

अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने मुंबई में 'लास्ट मैन इन टावर' के प्रमोशन के दौरान अपने शुरुआती करियर के संघर्षों का खुलासा किया।
उन्होंने बताया कि सीनियर्स ने उन्हें समझाया कि स्क्रीन पर सही तरीके से नजर आना अभिनय की एक अलग और महत्वपूर्ण कला है।
दिव्या के अनुसार, पहले डायलॉग और तकनीक को समझो — फिर पल में पूरी तरह डूब जाओ; यही अभिनय का असली जादू है।
फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' लेखक अरविंद अडिगा के उपन्यास पर आधारित है, जिसमें मनोज बाजपेयी मुख्य भूमिका में हैं।
फिल्म की कहानी मुंबई के पुनर्विकास की पृष्ठभूमि में मानवीय प्रतिरोध को दर्शाती है और फिलहाल सिनेमाघरों में प्रदर्शित है।

अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' को मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रिया के बीच मुंबई में अपने करियर के शुरुआती संघर्षों और अभिनय की तकनीकी बारीकियों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके सीनियर्स ने उन्हें स्क्रीन पर प्रभावी तरीके से प्रस्तुत होने की कला सिखाई, जो उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

सीनियर्स की सीख: स्क्रीन पर सही नजर आना

फिल्म के प्रमोशन के दौरान मुंबई में को-अभिनेता मनोज बाजपेयी और निर्देशक बेन रेखी के साथ आयोजित एक बातचीत में दिव्या दत्ता ने कहा, 'सबसे पहले, जहां तक मेरे लिए तकनीकी पहलुओं की बात है, अगर मुझे अपनी बुनियादी चीजें पता हैं, मैं अपना डायलॉग ठीक से बोल रही हूं और वह स्क्रीन पर सही तरीके से नजर आ रहा है, तो मेरे लिए इतना काफी है।'

उन्होंने आगे कहा कि एक दौर ऐसा भी था जब वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बावजूद स्क्रीन पर सही तरीके से नहीं दिख रही थीं। उस कठिन समय में उनके सीनियर्स ने उनका हाथ थामा और उन्हें सटीक सलाह दी।

दिव्या ने कहा, 'उस समय मेरे सीनियर्स ने मुझसे कहा, 'सुनो, तुम अच्छा कर रही हो, लेकिन स्क्रीन पर सही तरीके से नजर नहीं आ रही हो।' इस मामले में मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं।'

अभिनय का जादू: पल में खो जाना

दिव्या दत्ता ने अभिनय के अपने दर्शन को भी साझा किया। उनके अनुसार, पहले अपनी पंक्तियाँ तैयार करना और तकनीकी पहलुओं को समझना ज़रूरी है — लेकिन उसके बाद अभिनेता को उस पल में पूरी तरह डूब जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, 'अगर मैं अपने को-एक्टर की आंखों में देख रही हूं, तो शायद हर टेक अलग होगा। हर टेक में जब मैं उनकी आंखों में देखूंगी तो उससे एक अलग भावना पैदा हो सकती है।' यह टिप्पणी 'लास्ट मैन इन टावर' में मनोज बाजपेयी के साथ उनके साझा दृश्यों के संदर्भ में और भी प्रासंगिक लगती है।

दिव्या ने यह भी स्पष्ट किया कि भावना को बंधनों में बाँधना अभिनय को सीमित करता है। उनके शब्दों में, 'अगर आप बहुत ज्यादा बंध जाते हैं और सोचते हैं कि नहीं, यही सीमा है और मुझे इसी नोट पर परफॉर्म करना है, तो आपका अभिनय बहुत सीमित हो जाता है।'

फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' के बारे में

यह फिल्म प्रसिद्ध लेखक अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है और तेजी से बदलते मुंबई की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। फिल्म में मनोज बाजपेयी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर की भूमिका में हैं, जो एक पुरानी अपार्टमेंट बिल्डिंग में रहते हैं।

कहानी का केंद्र यह है कि जब एक अमीर डेवलपर निवासियों को बड़ी रकम की पेशकश करके इमारत को लग्जरी टावर में तब्दील करना चाहता है, तो ज़्यादातर लोग पैसे के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन मनोज बाजपेयी का किरदार वहाँ से जाने से इनकार कर देता है और पुनर्विकास योजना की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।

आम जनता पर असर और फिल्म की मौजूदा स्थिति

फिल्म को दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है, और 'लास्ट मैन इन टावर' फिलहाल सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है। यह फिल्म मुंबई की ज़मीनी हकीकत — शहरीकरण, विस्थापन और मानवीय प्रतिरोध — को परदे पर उतारने की कोशिश करती है, जो शहरी भारत के दर्शकों से सीधे जुड़ती है।

दिव्या दत्ता की यह खुलासे भरी बातचीत यह दर्शाती है कि बॉलीवुड में सफलता सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति पर भी निर्भर करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि शूटिंग फ्लोर पर ही क्यों न मिली हो। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 'लास्ट मैन इन टावर' जैसी साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्म के लिए इस तरह की गहन अभिनय-चर्चा मुख्यधारा के प्रमोशन का हिस्सा बनना, बॉलीवुड में सामग्री की परिपक्वता का संकेत देता है। हालाँकि, यह देखना बाकी है कि मुंबई के पुनर्विकास जैसी संवेदनशील सामाजिक थीम को फिल्म ने कितनी ईमानदारी से पर्दे पर उतारा है।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिव्या दत्ता ने अभिनय की बारीकियों के बारे में क्या कहा?
दिव्या दत्ता ने बताया कि करियर की शुरुआत में उनके सीनियर्स ने उन्हें समझाया कि वे अच्छा कर रही हैं, लेकिन स्क्रीन पर सही तरीके से नजर नहीं आ रहीं। इस सीख ने उनके अभिनय को एक नई दिशा दी।
'लास्ट मैन इन टावर' फिल्म किस पर आधारित है?
'लास्ट मैन इन टावर' लेखक अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म में मनोज बाजपेयी एक रिटायर्ड टीचर की भूमिका में हैं जो मुंबई की एक पुरानी इमारत के पुनर्विकास के विरोध में अकेले खड़े हो जाते हैं।
दिव्या दत्ता के अनुसार बेहतरीन अभिनय का राज क्या है?
दिव्या दत्ता के अनुसार, पहले डायलॉग और तकनीकी पहलुओं को ठीक से तैयार करना ज़रूरी है, उसके बाद अभिनेता को उस पल में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। अपने को-एक्टर की आँखों में देखने से हर टेक में अलग और स्वाभाविक भावना पैदा होती है।
'लास्ट मैन इन टावर' में मनोज बाजपेयी का किरदार क्या है?
मनोज बाजपेयी फिल्म में एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर की भूमिका निभा रहे हैं जो एक पुरानी अपार्टमेंट बिल्डिंग में रहते हैं। जब एक अमीर डेवलपर लग्जरी टावर बनाने के लिए बड़ी रकम की पेशकश करता है, तो यह किरदार अकेला वहाँ से जाने से इनकार कर देता है।
क्या 'लास्ट मैन इन टावर' सिनेमाघरों में उपलब्ध है?
हाँ, फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' फिलहाल सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है और इसे दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
राष्ट्र प्रेस
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