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मनोज बाजपेयी का 'लास्ट मैन इन टावर' पर खुलासा: 'किरदार अपनी ही अच्छाई का आदी हो जाता है'

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मनोज बाजपेयी का 'लास्ट मैन इन टावर' पर खुलासा: 'किरदार अपनी ही अच्छाई का आदी हो जाता है'

सारांश

मनोज बाजपेयी की 'लास्ट मैन इन टावर' सिर्फ एक बिल्डर बनाम किरायेदार की कहानी नहीं — यह एक ऐसे इंसान की कहानी है जो खुद को परिवार का 'नायक' मानता है, पर उसकी यही 'महानता' उसके अपनों के लिए बोझ बन जाती है।

मुख्य बातें

मनोज बाजपेयी फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' में एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर की भूमिका में हैं।
किरदार परिवार में 'बड़ा इंसान' बने रहने की चाह में अपने सबसे करीबी लोगों की ज़रूरतें नज़रअंदाज़ कर देता है।
फिल्म अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है और मुंबई की पृष्ठभूमि में सेट है।
कहानी का मुख्य संघर्ष: एक बिल्डर के ऑफर के सामने किरदार का अकेले डटे रहना, जबकि बाकी निवासी ऑफर स्वीकार कर लेते हैं।
बाजपेयी के अनुसार, ''कई बार हम अपनी ही अच्छाई के इतने आदी हो जाते हैं कि देखना बंद कर देते हैं कि वही 'महानता' दूसरों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।''

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता मनोज बाजपेयी इन दिनों अपनी नई फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। मुंबई की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म में उनके किरदार को दर्शकों की ओर से सराहना मिल रही है। बाजपेयी ने हाल ही में एक विस्तृत बातचीत में फिल्म के अपने पात्र के मनोविज्ञान की परतें खोलीं।

किरदार की आंतरिक जटिलता

मनोज बाजपेयी फिल्म में एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर की भूमिका निभा रहे हैं, जो जीवनभर खुद को परिवार का सबसे जिम्मेदार और नैतिक सदस्य मानता आया है। उन्होंने बताया कि उनका किरदार परिवार में सदा 'अच्छा इंसान' और 'बड़ा इंसान' बने रहने की चाह में इतना आगे निकल जाता है कि वह अपने सबसे करीबी लोगों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करने लगता है।

बाजपेयी ने कहा, ''मेरा किरदार हर चीज़ को सही और गलत के नज़रिए से देखने का आदी है। उसके लिए किसी भी परिस्थिति को बीच के रास्ते से देखने की गुंजाइश कम है। अगर मेरे किरदार की बैकस्टोरी को समझा जाए तो उसके बारे में कई बातें उसके बेटे के ज़रिए सामने आती हैं। वह परिवार में हमेशा खुद को अच्छा और दूसरों से बड़ा साबित करने की कोशिश करता रहा है।''

बेटे का आईना और बदलती तस्वीर

फिल्म का सबसे प्रभावशाली क्षण तब आता है, जब किरदार का बेटा उसके सामने उसकी सोच का दूसरा पहलू रखता है। बाजपेयी ने समझाया कि यह टकराव किरदार की पूरी आत्म-छवि को हिला देता है।

उन्होंने कहा, ''अपने परिवार के लिए कुछ करने और खुद को परिवार का 'बड़ा इंसान' समझने की इस कोशिश में वह अपने सबसे करीबी परिवार को ही कहीं पीछे छोड़ देता है। उसे हमेशा लगता है कि उसने अपने भाइयों के लिए इतना कुछ किया है, इसलिए उसके फैसलों और त्याग की क़द्र होनी चाहिए। लेकिन जब उसका बेटा उसके सामने यह बात रखता है कि उसकी इस सोच और व्यवहार का असर उसके अपने परिवार पर भी पड़ा है, तो उसके अंदर की पूरी तस्वीर हिल जाती है।''

अच्छाई का 'अहंकार' — किरदार का मर्म

बाजपेयी ने इस किरदार के केंद्रीय विरोधाभास को बड़ी सटीकता से व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ''उस वक्त मेरे किरदार को एहसास होता है कि जिस काम को वह इतने समय से अपनी सबसे बड़ी अच्छाई मानता आया था, वही उसके आसपास के लोगों के लिए परेशानी की वजह भी बन रहा था। कई बार हम अपनी ही अच्छाई या महानता के इतने आदी हो जाते हैं कि यह देखना बंद कर देते हैं कि हमारी वही 'महानता' दूसरों के लिए किस तरह मुश्किलें पैदा कर रही है।''

उन्होंने आगे जोड़ा, ''इंसान अक्सर अपने किए हुए कामों को एक खास नज़रिए से देखता है और खुद को सही साबित करने की कोशिश करता रहता है। असल चुनौती खुद को समझने की होती है। मेरे किरदार के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है, जहाँ उसे अपनी सोच और अपने फैसलों को एक अलग नज़रिए से देखने का मौका मिलता है।''

फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि

'लास्ट मैन इन टावर' प्रसिद्ध लेखक अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म की कहानी तेज़ी से बदलती मुंबई की पृष्ठभूमि में सेट है, जहाँ एक बड़ा बिल्डर पुरानी इमारत के सभी निवासियों को मोटी रकम देकर घर खाली करने का प्रस्ताव देता है। अधिकांश निवासी इस ऑफर को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

लेकिन मनोज का किरदार अपना घर छोड़ने से स्पष्ट इनकार कर देता है और पूरी बिल्डिंग को खाली कराने की योजना के बीच अकेली बड़ी रुकावट बन जाता है। यह कहानी महज़ घर बचाने की लड़ाई तक सीमित नहीं रहती — इसके ज़रिए परिवार, रिश्ते, पैसा, नैतिकता और इंसान के खुद के बारे में बनाए नज़रिए को भी गहराई से उकेरा गया है।

दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रिया

फिल्म में बाजपेयी के किरदार को दर्शकों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। गौरतलब है कि मनोज बाजपेयी हिंदी सिनेमा में जटिल और बहुआयामी किरदारों के लिए जाने जाते हैं, और 'लास्ट मैन इन टावर' उनकी इस छवि को और मज़बूत करती नज़र आती है। आने वाले दिनों में फिल्म की बॉक्स ऑफिस परफॉर्मेंस पर सबकी नज़र रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह हिंदी सिनेमा में अपेक्षाकृत दुर्लभ है — नायक की नैतिक अंधता, जो खलनायकी से नहीं, बल्कि अतिरिक्त 'सदाचार' से जन्म लेती है। अरविंद अडिगा के मूल उपन्यास ने यह सवाल उठाया था कि विकास की दौड़ में 'अड़ियल नायक' असल में कौन है — और फिल्म इसे पारिवारिक मनोविज्ञान की परत में लपेट कर और गहरा कर देती है। सवाल यह है कि क्या हिंदी दर्शक इस 'ग्रे' नायक को उस तरह अपनाएगा जैसे OTT पर जटिल किरदार स्वीकार किए जाते हैं — या थिएटर अभी भी स्पष्ट नायक-खलनायक की माँग करता है।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'लास्ट मैन इन टावर' फिल्म किस पर आधारित है?
यह फिल्म प्रसिद्ध लेखक अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। इसकी कहानी तेज़ी से बदलती मुंबई की पृष्ठभूमि में एक पुरानी इमारत के निवासियों और एक बड़े बिल्डर के बीच के संघर्ष पर केंद्रित है।
मनोज बाजपेयी 'लास्ट मैन इन टावर' में कौन सा किरदार निभा रहे हैं?
मनोज बाजपेयी फिल्म में एक रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर की भूमिका में हैं, जो खुद को हमेशा परिवार का सबसे जिम्मेदार और नैतिक सदस्य मानता है। जब एक बिल्डर इमारत खाली करने का ऑफर देता है, तो यही किरदार अकेली बड़ी रुकावट बनकर खड़ा हो जाता है।
मनोज बाजपेयी ने अपने किरदार के बारे में क्या कहा?
बाजपेयी ने कहा कि उनका किरदार 'अपनी ही अच्छाई का आदी' हो जाता है — वह परिवार में 'बड़ा इंसान' बने रहने की चाह में अपने सबसे करीबी लोगों की ज़रूरतें नज़रअंदाज़ कर देता है। उन्होंने कहा, 'कई बार हम अपनी महानता के इतने आदी हो जाते हैं कि यह देखना बंद कर देते हैं कि वही महानता दूसरों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।'
फिल्म में किरदार का बेटा क्या भूमिका निभाता है?
फिल्म में बेटे का किरदार एक 'आईने' की तरह काम करता है — वह मनोज के किरदार को उसकी सोच का वह पहलू दिखाता है, जिससे वह अब तक अनजान था। बेटे द्वारा यह बताया जाना कि उसके व्यवहार का असर उसके अपने परिवार पर भी पड़ा है, किरदार की पूरी आत्म-छवि को हिला देता है।
'लास्ट मैन इन टावर' की कहानी सिर्फ घर बचाने तक सीमित है?
नहीं, फिल्म की कहानी घर बचाने की लड़ाई से कहीं आगे जाती है। इसके ज़रिए परिवार, रिश्ते, पैसा, नैतिकता और इंसान के खुद के बारे में बनाए नज़रिए को गहराई से उकेरा गया है।
राष्ट्र प्रेस
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