रुबीना दिलैक का जवाब: दादा-दादी का 'रिटायरमेंट' नहीं, जीवा-ईधा की परवरिश में अहम भूमिका
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री रुबीना दिलैक ने अपनी जुड़वां बेटियों जीवा और ईधा की परवरिश को लेकर सोशल मीडिया पर उठ रही आलोचनाओं को सीधे खारिज किया है। रुबीना ने स्पष्ट किया कि उनके माता-पिता स्वेच्छा से पोतियों की देखभाल कर रहे हैं और इसमें उन्हें खुशी मिलती है — यह कोई बोझ नहीं, बल्कि उनका अपना चुनाव है।
आलोचना की पृष्ठभूमि
फिलहाल जीवा और ईधा शिमला में रुबीना के माता-पिता के साथ रह रही हैं, जबकि रुबीना मुंबई में अपनी पेशेवर जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं। कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने यह सवाल उठाया था कि वरिष्ठ नागरिक माता-पिता को पोतियों की देखभाल के बजाय अपने जीवन पर ध्यान देना चाहिए।
रुबीना की दो-टूक प्रतिक्रिया
रुबीना ने इस सोच को चुनौती देते हुए कहा, 'समाज कहता है कि दादा-दादी या नाना-नानी को अब रिटायर होकर अलग से अपनी जिंदगी का आनंद लेना चाहिए, लेकिन मेरे माता-पिता या सास-ससुर इस सोच से सहमत नहीं हैं। वे अपनी मर्जी से हमें सपोर्ट करना चाहते हैं और बच्चों के साथ रहना चाहते हैं। जब वे खुद इसमें खुश हैं, तो बाहरी लोगों की इन बातों से फर्क नहीं पड़ता — उन्हें जो भी कहना है, कहने दो।'
माँ को मिला नया मकसद
रुबीना ने बताया कि वरिष्ठ नागरिक होने के बाद भी उनकी माँ को पोतियों की परवरिश में एक नई ऊर्जा और जीवन का नया उद्देश्य मिला है। उन्होंने कहा, 'मेरी मां कहती हैं कि जब वह जीवा और ईधा की आंखों में देखती हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्हें दूसरी जिंदगी मिल गई है। वे इस समय को अपनी पोतियों को पालने-पोसने में लगाना चाहती हैं।'
पति अभिनव शुक्ला और ससुराल का साथ
रुबीना ने पति अभिनव शुक्ला के माता-पिता की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि ससुराल वाले जरूरत पड़ने पर लुधियाना से मुंबई आकर बच्चों की देखभाल में सहयोग करते हैं। रुबीना ने कहा, 'मुझे अपने परिवार — खासकर अभिनव — से बहुत सपोर्ट मिलता है। मेरी जो भी उपलब्धियाँ हैं, वे उनकी वजह से हैं। अभिनव मुझसे ज्यादा बेटियों का ख्याल रखते हैं, मेरी मां उनका ध्यान रखती हैं और ससुराल वाले भी बच्चों के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। मैं बहुत शुक्रगुजार हूं।'
बड़ा सवाल: परिवार बनाम समाज की अपेक्षाएँ
रुबीना का यह बयान उस व्यापक सामाजिक बहस को छूता है जिसमें कामकाजी माताओं और बुजुर्ग परिजनों की भूमिका को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में संयुक्त परिवार की अवधारणा और 'ग्रैंडपेरेंटिंग' की भूमिका पर नई पीढ़ी के बीच बहस तेज हो रही है। रुबीना का रुख स्पष्ट है — जब परिवार के सभी सदस्य सहमत और प्रसन्न हों, तो बाहरी राय की कोई जगह नहीं।