जब ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग के दौरान भीड़ ने बलराज साहनी और निरूपा रॉय को सुनाई खरी-खोटी
सारांश
Key Takeaways
- बलराज साहनी का अभिनय दर्शकों को वास्तविकता का अनुभव कराता था।
- फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग के दौरान एक अनोखा किस्सा हुआ।
- निरूपा रॉय ने अपनी साक्षात्कार में इस घटना का उल्लेख किया।
- बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर साहनी था।
- उनकी अभिनय कला आज भी याद की जाती है।
मुंबई, 13 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे अद्वितीय कलाकार रहे हैं, जिनकी अभिनय कला इतनी वास्तविक और प्रभावशाली होती थी कि दर्शक उन्हें देखकर भूल जाते थे कि यह केवल एक फिल्म का दृश्य है। ऐसे ही एक शानदार अभिनेता थे बलराज साहनी, जिनकी अभिनय शैली इतनी प्रामाणिक थी कि लोग उन्हें असली जीवन का पात्र समझ लेते थे।
इस वास्तविक अभिनय का एक दिलचस्प किस्सा 1953 में आई क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ से जुड़ा है। इस किस्से को खुद अभिनेत्री निरूपा रॉय ने एक साक्षात्कार में साझा किया था। उन्होंने बताया कि, “फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग कोलकाता में हो रही थी। बिमल रॉय निर्देशक थे। इस फिल्म में मुझे और बलराज साहनी को पति-पत्नी के किरदार में कास्ट किया गया था। एक सीन में हमें ट्राम के पास से सड़क पार करनी थी। निर्देशक ने कहा कि कैमरा टैक्सी में छिपा दिया जाएगा और हमें सामान्य तरीके से सड़क पार करनी है।”
जैसे ही शूटिंग शुरू हुई और बलराज साहनी सड़क पार कर रहे थे, उन्हें हल्की चोट लग गई। यह देखकर वहां उपस्थित भीड़ भड़क गई। लोग गुस्से में चिल्लाने लगे और बलराज साहनी और निरूपा रॉय को खरी-खोटी सुनाने लगे। भीड़ उन्हें समझा रही थी कि सड़क पार करने का तरीका यह नहीं होता।
निरूपा रॉय ने हंसते हुए कहा, “हम दोनों आश्चर्यचकित थे। हमें भीड़ को यह बताना मुश्किल था कि हम फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं। बलराज साहनी की अभिनय कला इतनी वास्तविक थी कि लोग यह समझ नहीं पाए कि यह केवल अभिनय है। उन्हें लगा कि कोई असली व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ लापरवाही से सड़क पार कर रहा है।”
बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर साहनी था। उनका जन्म 1 मई 1913 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता आर्य समाज से जुड़े थे। बचपन से ही अभिनय का शौक रखने वाले बलराज साहनी इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन से जुड़े और 1946 में फिल्म ‘इंसाफ’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। लेकिन असली पहचान उन्हें बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ से मिली। इस फिल्म में किसान की भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। फिल्म को कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी सराहा गया।
बलराज साहनी मार्क्सवादी विचारधारा के अनुयायी थे। उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी अंतिम यात्रा में उनके शरीर पर लाल झंडा डाला जाए। उनके बेटे परीक्षत साहनी ने किताब ‘द नॉन-कॉन्फॉर्मिस्ट’ में बताया कि उनके पिता उनके सबसे अच्छे दोस्त थे। बलराज साहनी ने परीक्षत से कहा था – “मुझे पिता मत समझो, मुझे अपना दोस्त समझो।”
बलराज साहनी को ‘धरती के लाल’, ‘छोटी बहन’, ‘काबुलीवाला’, ‘वक्त’ और ‘गर्म हवा’ जैसी यादगार फिल्मों के लिए आज भी याद किया जाता है।