क्या कश्मीरी पंडितों के पलायन को 36 साल पूरे हो गए? अशोक पंडित ने पीएम मोदी से की खास अपील
सारांश
Key Takeaways
- कश्मीरी पंडितों का पलायन 1990 में हुआ था।
- अशोक पंडित ने पीएम मोदी से विशेष कदम उठाने की अपील की।
- जगती कैंप में पंडितों की दयनीय स्थिति है।
- 36 सालों से कश्मीरी पंडित शरणार्थी जीवन जी रहे हैं।
- समिति का गठन आवश्यक है ताकि उनकी जरूरतों का मूल्यांकन किया जा सके।
मुंबई, 19 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। फिल्म निर्माता और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पंडित ने कश्मीरी हिंदुओं के 1990 के पलायन की 36वीं वर्षगांठ पर एक भावुक अपील की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर अपने दुःख को व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विशेष अनुरोध किया।
अशोक पंडित ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर वीडियो साझा करते हुए पीएम मोदी से कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और आवश्यक सुविधाओं के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की। उन्होंने याद करते हुए कहा कि 18 और 19 जनवरी की आधी रात को कश्मीर घाटी में अंधेरा छा गया था। मस्जिदों को छोड़कर अन्य जगहों की बिजली काट दी गई और मस्जिदों से भड़काऊ संदेश प्रसारित किए गए, जिसमें कश्मीरी हिंदुओं को खत्म करने की धमकी दी गई थी।
पोस्ट में उन्होंने लिखा कि 36 साल बीत चुके हैं, लेकिन कश्मीरी पंडित आज भी अपने ही देश में शरणार्थी की जिंदगी जी रहे हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि पुनर्वास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनी है। किसी भी फैसले में कश्मीरी पंडितों की राय नहीं ली जाती।
अशोक पंडित ने कहा कि किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल के बड़े नेता ने जम्मू के जगती कैंप का दौरा नहीं किया है, जो कश्मीरी पंडितों का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर है। यहां लोग अत्यंत दुःखद हालात में रह रहे हैं, बिना बुनियादी सुविधाओं के।
उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से अनुरोध किया कि वह एक उच्च स्तरीय समिति गठित करें, जिसमें वरिष्ठ नेता शामिल हों। यह समिति जगती कैंप का दौरा कर पिछले 36 सालों से संघर्ष कर रहे इस शांतिप्रिय समुदाय की आवश्यकताओं का मूल्यांकन करे। समिति के माध्यम से सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि कश्मीरी पंडित एक सम्मानजनक जीवन जी सकें। यह समुदाय न्याय और घर वापसी की उम्मीद कर रहा है।
कश्मीरी पंडितों का पलायन 1990 में घाटी से हुआ था, जब अलगाववादी ताकतों और हिंसा के कारण हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा। आज भी कई परिवार जम्मू और अन्य स्थानों पर शरणार्थी कैंपों में निवास कर रहे हैं।