सांभा बनने से पहले क्रिकेटर बनना चाहते थे मैक मोहन, जानें कैसे बदली जिंदगी
सारांश
Key Takeaways
- मैक मोहन का जन्म 24 अप्रैल 1938 को कराची में हुआ था और उनका असली नाम मोहन माखीजानी था।
- क्रिकेटर बनने का सपना लेकर 1952 में मुंबई आए, लेकिन शौकत कैफी के नाटक ने उन्हें अभिनय की दुनिया में खींच लिया।
- 1964 में फिल्म 'हकीकत' से बॉलीवुड डेब्यू किया और 1975 में 'शोले' के सांभा किरदार से अमर हो गए।
- उनका डायलॉग 'पूरे पचास हजार' भारतीय सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध संवादों में से एक है।
- अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया और 9 से अधिक भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया।
- 10 मई 2010 को फेफड़ों के कैंसर के कारण उनका निधन हो गया।
मुंबई: बॉलीवुड के सबसे यादगार खलनायकों में शुमार मैक मोहन का असली सपना कभी अभिनय नहीं, बल्कि क्रिकेट था। 24 अप्रैल 1938 को कराची में जन्मे इस अभिनेता ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट टीम तक का सफर तय किया, लेकिन मुंबई की गलियों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का एक अमर चेहरा बना दिया। 'शोले' के सांभा के रूप में उनका नाम आज भी करोड़ों दर्शकों की जुबान पर है।
कराची से लखनऊ तक का सफर
मैक मोहन का असली नाम मोहन माखीजानी था। उनके पिता ब्रिटिश आर्मी में कर्नल के पद पर तैनात थे। 1940 में पिता का तबादला कराची से लखनऊ हो जाने के बाद पूरा परिवार उत्तर प्रदेश की राजधानी में बस गया। लखनऊ की तहजीब और माहौल में पले-बढ़े मैक मोहन के बचपन के सपनों ने यहीं आकार लेना शुरू किया।
बचपन से ही क्रिकेट उनकी रगों में दौड़ता था। घंटों मैदान पर पसीना बहाने के बाद उन्होंने कड़ी मेहनत से उत्तर प्रदेश क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाई। उस दौर में उनका पूरा ध्यान बल्ले और गेंद पर केंद्रित था और वह एक बेहतरीन क्रिकेटर बनने के ख्वाब संजोए हुए थे।
मुंबई ने बदल दी जिंदगी की दिशा
1952 में बेहतर क्रिकेट प्रशिक्षण की तलाश में मैक मोहन मुंबई पहुंचे। लेकिन इस शहर ने उन्हें कुछ और ही दिखाया। थिएटर और रंगमंच की दुनिया से पहली बार रू-ब-रू होने पर उनके भीतर कुछ जाग उठा। धीरे-धीरे क्रिकेट की जगह अभिनय ने उनके मन में घर बनाना शुरू कर दिया।
इसी दौरान उन्हें मशहूर लेखिका शौकत कैफी के एक नाटक में काम करने का अवसर मिला। उस वक्त आर्थिक जरूरत थी, इसलिए उन्होंने ऑडिशन दिया और चुन लिए गए। यही वह मोड़ था जहां से मैक मोहन का अभिनय करियर शुरू हुआ। बाद में उन्होंने पुणे स्थित प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से विधिवत अभिनय प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
शोले का सांभा — एक अमर किरदार
1964 में फिल्म 'हकीकत' से बॉलीवुड में पदार्पण करने वाले मैक मोहन ने शुरुआती वर्षों में कई छोटी भूमिकाएं निभाईं। लेकिन असली पहचान उन्हें 1975 में आई महाकाव्य फिल्म 'शोले' से मिली। निर्देशक रमेश सिप्पी की इस फिल्म में उनका सांभा का किरदार महज कुछ ही दृश्यों तक सीमित था, फिर भी वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो गया।
उनका डायलॉग 'पूरे पचास हजार' आज भी भारतीय सिनेमा के सर्वाधिक उद्धृत संवादों में गिना जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि एक कुशल अभिनेता छोटे से किरदार को भी कालजयी बना सकता है। सांभा की यह भूमिका बाद में कई पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक प्रतीक बन गई।
200 से अधिक फिल्मों का शानदार करियर
'शोले' के बाद मैक मोहन ने 'डॉन', 'जंजीर', 'कर्ज', 'सत्ते पे सत्ता', 'खून पसीना' और 'शान' जैसी दर्जनों बड़ी फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अपने पूरे करियर में उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। नकारात्मक या सहायक भूमिकाओं में भी वह हर बार एक अलग छाप छोड़ जाते थे।
उनकी बहुभाषी प्रतिभा भी उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती थी। हिंदी के अलावा उन्होंने भोजपुरी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगाली, हरियाणवी और सिंधी फिल्मों में भी अभिनय किया। यहां तक कि अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिश भाषा की फिल्मों में भी उनकी भूमिकाएं रहीं, जो उनकी असाधारण बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।
अंतिम समय और विरासत
फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' की शूटिंग के दौरान मैक मोहन की तबीयत अचानक बिगड़ गई। जांच में उनके फेफड़े में ट्यूमर की पुष्टि हुई, जो बाद में कैंसर में तब्दील हो गया। लंबे और कठिन इलाज के बावजूद 10 मई 2010 को उनका निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खोया जिसने साबित किया कि पर्दे पर कम समय के लिए आने वाला किरदार भी सदियों तक याद रखा जा सकता है।
आज 24 अप्रैल को उनकी जयंती पर उनके चाहने वाले उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। सांभा का किरदार और 'पूरे पचास हजार' का वह संवाद तब तक जिंदा रहेगा, जब तक 'शोले' देखी और सुनी जाती रहेगी।