सांभा बनने से पहले क्रिकेटर बनना चाहते थे मैक मोहन, जानें कैसे बदली जिंदगी
सारांश
Key Takeaways
- मैक मोहन का जन्म 24 अप्रैल 1938 को कराची में हुआ था, उनका असली नाम मोहन माखीजानी था।
- वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट टीम में खेल चुके थे और क्रिकेटर बनने का सपना देखते थे।
- 1952 में मुंबई आने के बाद शौकत कैफी के नाटक से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई।
- 1975 में 'शोले' के सांभा किरदार और डायलॉग 'पूरे पचास हजार' ने उन्हें अमर बना दिया।
- उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया और 8 भारतीय भाषाओं सहित अंग्रेजी, रूसी व स्पेनिश फिल्मों में भी अभिनय किया।
- 10 मई 2010 को फेफड़े के कैंसर के कारण उनका निधन हो गया।
मुंबई: बॉलीवुड के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो पर्दे पर महज कुछ पलों के लिए आते हैं, लेकिन दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए घर कर लेते हैं। मैक मोहन ऐसे ही एक अभिनेता थे, जिन्होंने 1975 में आई फिल्म 'शोले' में सांभा का किरदार निभाकर भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया। दिलचस्प बात यह है कि उनका मूल सपना अभिनय नहीं, बल्कि क्रिकेट था।
कराची से लखनऊ तक का सफर
मैक मोहन का जन्म 24 अप्रैल 1938 को कराची में हुआ था, जो तब ब्रिटिश भारत का अभिन्न हिस्सा था। उनका असली नाम मोहन माखीजानी था। उनके पिता ब्रिटिश आर्मी में कर्नल के पद पर कार्यरत थे।
साल 1940 में पिता का तबादला कराची से लखनऊ हो गया और पूरा परिवार उत्तर प्रदेश की राजधानी में बस गया। लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब के बीच मैक मोहन की परवरिश हुई और यहीं उनके बचपन के सपनों ने पंख फैलाने शुरू किए।
क्रिकेट का जुनून और उत्तर प्रदेश टीम में चयन
बचपन से ही मैक मोहन को क्रिकेट से गहरा लगाव था। वह घंटों मैदान पर अभ्यास करते और एक दिन राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का सपना देखते थे। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने उत्तर प्रदेश क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाई — यह उस दौर में किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
क्रिकेट करियर को ऊंचाई देने के इरादे से वह 1952 में मुंबई आए। उनका मानना था कि देश की आर्थिक राजधानी में बेहतर प्रशिक्षण और अवसर मिलेंगे। लेकिन मुंबई की चमक-दमक ने उनकी जिंदगी का रुख पूरी तरह बदल दिया।
थिएटर ने बदली जिंदगी की दिशा
मुंबई आने के बाद मैक मोहन ने पहली बार रंगमंच और थिएटर की दुनिया से साक्षात्कार किया। मंच पर कलाकारों को जीवंत किरदार निभाते देख उनके भीतर कुछ जागा। धीरे-धीरे क्रिकेट की जगह अभिनय ने लेनी शुरू कर दी।
इसी दौरान उन्हें प्रसिद्ध लेखिका और अभिनेत्री शौकत कैफी के एक नाटक में काम करने का मौका मिला। उस वक्त आर्थिक जरूरत थी, इसलिए उन्होंने बिना किसी तैयारी के ऑडिशन दिया और चुन लिए गए। यही वह पल था जब एक क्रिकेटर का अभिनेता बनने का सफर शुरू हुआ।
अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से विधिवत प्रशिक्षण लिया। यह संस्था आज भी भारतीय सिनेमा को श्रेष्ठ कलाकार देती आ रही है।
बॉलीवुड में प्रवेश और 'सांभा' बनने तक का सफर
साल 1964 में फिल्म 'हकीकत' से मैक मोहन ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। शुरुआती वर्षों में उन्होंने छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाईं, लेकिन हर किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ी।
असली पहचान मिली 1975 में जब रमेश सिप्पी निर्देशित 'शोले' रिलीज हुई। इस फिल्म में उन्होंने डाकू गब्बर सिंह के गुर्गे सांभा की भूमिका निभाई। उनका डायलॉग 'पूरे पचास हजार' भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित संवादों में शुमार है। पर्दे पर उनका स्क्रीन टाइम भले ही कम था, लेकिन उनकी उपस्थिति ने दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी।
यह उल्लेखनीय है कि 'शोले' को भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है और इसके हर किरदार ने सांस्कृतिक इतिहास में अपनी जगह बनाई। सांभा का किरदार इस बात का प्रमाण है कि एक कुशल अभिनेता छोटी भूमिका में भी महान प्रभाव छोड़ सकता है।
बहुभाषी अभिनेता और विशाल फिल्मोग्राफी
मैक मोहन ने अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। 'डॉन', 'कर्ज', 'सत्ते पे सत्ता', 'जंजीर', 'खून पसीना' और 'शान' जैसी दर्जनों बड़ी फिल्मों में उन्होंने नकारात्मक और सहायक भूमिकाएं निभाईं।
उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हिंदी के अलावा भोजपुरी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगाली, हरियाणवी और सिंधी भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया। यहां तक कि अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिश फिल्मों में भी उनकी अभिनय क्षमता का लोहा माना गया।
जिंदगी का आखिरी संघर्ष
फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' की शूटिंग के दौरान मैक मोहन की तबीयत बिगड़ने लगी। जांच में पता चला कि उनके फेफड़े में ट्यूमर है, जो बाद में कैंसर में बदल गया। लंबे समय तक इलाज चलता रहा, लेकिन 10 मई 2010 को इस महान अभिनेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
मैक मोहन की कहानी यह बताती है कि प्रतिभा का कोई एक रास्ता नहीं होता। एक क्रिकेटर जो अभिनेता बना, वह भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार चरित्रों में से एक बन गया। उनकी जन्मशती पर उनके अनगिनत प्रशंसक उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं और 'पूरे पचास हजार' का वह डायलॉग आज भी गूंजता है।