'मस्कारा' सॉन्ग की शूटिंग इरशाद कामिल के शहर मलेरकोटला में, इम्तियाज अली बोले — 'यह पल भावुक और अविश्वसनीय था'
सारांश
मुख्य बातें
निर्देशक इम्तियाज अली की आने वाली फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' के गाने 'मस्कारा' की शूटिंग पंजाब के मलेरकोटला शहर में की गई — जो मशहूर गीतकार इरशाद कामिल का गृहनगर है। फिल्म के प्रमोशन के दौरान इम्तियाज अली ने इस शूटिंग से जुड़े एक भावुक अनुभव को साझा किया, जिसने उन्हें अंदर तक छू लिया।
मलेरकोटला: एक खास लोकेशन की कहानी
इम्तियाज अली ने बताया, मलेरकोटला बेहद खूबसूरत लोकेशन है और इससे एक गहरी भावनात्मक याद जुड़ी है। उन्होंने कहा, 'यह वही शहर है, जहाँ से इरशाद कामिल ने अपने सपनों की शुरुआत की थी।' यह पहला मौका था जब इम्तियाज अली किसी गाने की शूटिंग इरशाद कामिल के लिखे बोलों के साथ उन्हीं के गृहनगर में कर रहे थे।
इम्तियाज और इरशाद का पुराना साथ
इम्तियाज अली ने बताया कि उन्होंने इरशाद कामिल को उस दौर से देखा है जब वे फिल्म इंडस्ट्री में अपने कदम जमा रहे थे। उन्होंने कहा, 'मेरी पहली फिल्म और इरशाद की पहली फिल्म लगभग एक ही समय में आई थी, इसलिए हमारे सफर में एक खास जुड़ाव हमेशा रहा है।' यह पुराना रिश्ता ही था जिसने मलेरकोटला की शूटिंग को उनके लिए और भी अर्थपूर्ण बना दिया।
भावुक कर देने वाला पल
निर्देशक ने उस विशेष क्षण को याद करते हुए कहा, 'मलेरकोटला में शूटिंग के दौरान मेरे मन में यह बात आई कि कभी इस छोटे शहर का एक लड़का रोज़गार और पहचान की तलाश में मुंबई गया था, और आज उसी के लिखे गाने पर फिल्म बनाने के लिए मुंबई से करीब 200 लोग उनके शहर पहुँचे हैं। यह पल वाकई अलग, भावुक और अविश्वसनीय था।'
मौसम ने बदला लोकेशन का रूप
इम्तियाज अली ने बताया कि जब उनकी टीम पहली बार मलेरकोटला पहुँची थी, तब वह जगह उतनी आकर्षक नहीं लग रही थी। शुरुआत में वहाँ फूल और हरियाली नहीं थी, लेकिन मौसम बदलने के साथ उस जगह का पूरा रूप बदल गया। उन्होंने कहा, 'कई बार किसी जगह की असली खूबसूरती समय और मौसम के साथ सामने आती है।' अंततः वह लोकेशन स्क्रीन पर बेहद खूबसूरत नज़र आने लगी।
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' के बारे में
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' की कहानी भारत के विभाजन से पहले के पंजाब पर आधारित है — दो प्रेमियों की कहानी जिसमें पुराने पंजाब की संस्कृति, भावनाएँ और उस दौर का माहौल दर्शाया जाएगा। फिल्म में पंजाब की पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक खंडहरों को विशेष रूप से शामिल किया गया है, ताकि दर्शकों को उस युग का वास्तविक अनुभव मिल सके। यह फिल्म इम्तियाज अली की संवेदनशील कहानीकारी की परंपरा को आगे बढ़ाने का एक और प्रयास है।