सूफी संगीत पर मुज्तबा अजीज नजा का बड़ा खुलासा — फिल्मों में सिमट रही कव्वाली की रूह
सारांश
Key Takeaways
- मुज्तबा अजीज नजा ने कहा कि आज की हिंदी फिल्मों में सूफी संगीत और कव्वाली केवल 'इमोशनल सीन' तक सीमित होकर रह गई है।
- एक दौर था जब हर हिंदी फिल्म में कम से कम एक कव्वाली अनिवार्य रूप से होती थी, लेकिन अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है।
- नजा ने संजय लीला भंसाली की फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' में काम करने को अपने जीवन का सबसे बड़ा सीखने का अनुभव बताया।
- गायक ने कहा कि लाइव परफॉर्मेंस में दर्शकों की ऊर्जा के अनुसार गानों का क्रम बदलना ही कव्वाली की असली ताकत है।
- डिजिटल युग में लोगों की 'स्क्रॉलिंग' आदत को उन्होंने सूफी संगीत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया।
- नजा एक प्रतिष्ठित संगीत घराने से हैं और उन्होंने 'पद्मावत' जैसी महाकाव्य फिल्मों में भी अपनी गायकी दी है।
मुंबई, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सूफी और कव्वाली संगीत की दुनिया में अपनी रूहानी आवाज के लिए मशहूर प्लेबैक सिंगर मुज्तबा अजीज नजा ने राष्ट्र प्रेस के साथ एक खास बातचीत में सूफी संगीत की बदलती और सिमटती दशा पर गहरी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि आज का डिजिटल और फास्ट-फॉरवर्ड जमाना सूफी संगीत की आत्मा को धीरे-धीरे निगल रहा है। बाजीराव मस्तानी और पद्मावत जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में अपनी गायकी का परचम लहरा चुके नजा का यह बयान संगीत प्रेमियों के बीच गहरी बहस छेड़ सकता है।
फिल्मों में कव्वाली का सिमटता दायरा
मुज्तबा अजीज नजा ने कहा कि एक वक्त था जब हिंदी सिनेमा की हर फिल्म में कम से कम एक कव्वाली अनिवार्य रूप से शामिल होती थी। वह दौर अब इतिहास बन चुका है। आज की फिल्मों में सूफी संगीत और कव्वाली केवल किसी 'इमोशनल सीन' या कहानी की खास जरूरत के वक्त ही इस्तेमाल होती है।
उन्होंने कहा, "सूफी संगीत की असली आत्मा उसकी गहराई में बसती है।" लेकिन आज जब लोग गानों को सुनने की बजाय 'स्क्रॉल' करते हैं, तो उस गहराई तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। सूफी संगीत सब्र और सुकून मांगता है, जबकि डिजिटल युग में ध्यान की अवधि लगातार घटती जा रही है।
यह विडंबना ही है कि जिस देश में अमीर खुसरो जैसे महान सूफी संतों ने कव्वाली को एक आध्यात्मिक विधा के रूप में स्थापित किया, वहां आज यह संगीत शैली बॉलीवुड की व्यावसायिक जरूरतों के बीच अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद कर रही है।
लाइव परफॉर्मेंस में कव्वाली की असली ताकत
गायक ने बताया कि कव्वाली का जादू स्टूडियो रिकॉर्डिंग में नहीं, बल्कि लाइव परफॉर्मेंस में है। उन्होंने कहा, "हम गानों की लिस्ट तो बनाकर ले जाते हैं, लेकिन जैसे ही मंच पर पहुंचते हैं, दर्शकों का उत्साह सब कुछ बदल देता है।"
मंच पर दर्शकों की ऊर्जा के अनुसार गानों का क्रम और अंदाज बदलना ही कव्वाली की सबसे बड़ी विशेषता है। यह सहजता और तात्कालिकता ही इस विधा को अन्य संगीत शैलियों से अलग और अनूठा बनाती है।
विरासत का बोझ और खुद की पहचान
मुज्तबा अजीज नजा एक प्रतिष्ठित संगीत घराने से आते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि किसी बड़े नाम से जुड़ी विरासत के साथ करियर शुरू करना एक दोधारी तलवार की तरह होता है। उन्होंने कहा, "शुरुआत में मुझे उस जिम्मेदारी का अंदाजा नहीं था, इसलिए राह थोड़ी आसान लगी।"
लेकिन समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि असली चुनौती विरासत की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाना है। उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी कला को निरंतर निखारते रहे।
संजय लीला भंसाली के साथ 'लाइफ-चेंजिंग' अनुभव
फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली की महाकाव्य फिल्मों 'बाजीराव मस्तानी' और 'पद्मावत' में अपनी गायकी से छाप छोड़ने वाले नजा ने भंसाली के साथ काम करने को अपने जीवन का सबसे बड़ा सीखने का अनुभव बताया।
उन्होंने कहा, "संजय सर एक परफेक्शनिस्ट हैं। वे अपनी कला के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।" नजा के अनुसार 'बाजीराव मस्तानी' उनके लिए महज एक फिल्म नहीं, बल्कि एक संगीत पाठशाला थी। भले ही वे मुख्य कलाकार नहीं थे, लेकिन उस संगीत का हिस्सा होना अपने आप में गर्व की बात थी।
उन्होंने यह भी बताया कि भंसाली के साथ कोई रचनात्मक मतभेद कभी नहीं हुआ, क्योंकि उनका विजन कलाकार को उसका सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करता है। कई बार कंपोजीशन इतनी तेजी से तैयार हुए कि वे पल खुद में जादुई बन गए।
सूफी संगीत का भविष्य — एक चिंताजनक तस्वीर
मुज्तबा अजीज नजा का यह बयान केवल एक गायक की व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि यह भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत की उस व्यापक चुनौती की ओर इशारा करता है जिसका सामना आज हर पारंपरिक विधा कर रही है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और शॉर्ट वीडियो ऐप्स के दौर में जहां तीन मिनट का गाना भी लंबा लगने लगा है, वहां कव्वाली जैसी विधा — जो घंटों तक चलती है और श्रोता की पूर्ण उपस्थिति मांगती है — का टिके रहना वाकई एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है।
आने वाले समय में देखना होगा कि क्या नई पीढ़ी के संगीतकार और गायक सूफी संगीत को डिजिटल युग के साथ तालमेल बिठाते हुए उसकी आत्मा को भी जीवित रख पाते हैं।