पाथेर पांचाली का अस्तित्व जरूरी: कौस्तव नारायण बोले, 'शोले' की भीड़ से कला नहीं मरनी चाहिए

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पाथेर पांचाली का अस्तित्व जरूरी: कौस्तव नारायण बोले, 'शोले' की भीड़ से कला नहीं मरनी चाहिए

सारांश

निर्देशक कौस्तव नारायण ने पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में कहा कि 'शोले' की भीड़ के बावजूद 'पाथेर पांचाली' जैसी कलात्मक फिल्मों का अस्तित्व जरूरी है। सत्यजीत रे की विरासत को बचाने के लिए निर्माताओं को मुनाफे से परे सोचना होगा।

Key Takeaways

  • निर्देशक कौस्तव नारायण निरोगी ने पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में कहा कि 'पाथेर पांचाली' जैसी कलात्मक फिल्मों का अस्तित्व हमेशा जरूरी रहेगा।
  • शोले और पाथेर पांचाली के उदाहरण से उन्होंने समझाया कि भीड़ कम होना किसी फिल्म की प्रासंगिकता खत्म नहीं करता।
  • सत्यजीत रे से जुड़े जीपीसीपी किस्से के जरिए उन्होंने रे की असाधारण विश्वसनीयता और कद को रेखांकित किया।
  • ऋत्विक घटक का उदाहरण देते हुए कौस्तव ने कहा कि सीमित बजट में भी महान सिनेमा रचा जा सकता है।
  • लेखक विभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने एक आठ साल की बच्ची से प्रेरित होकर अपनी पुरानी स्क्रिप्ट फाड़ी और 'दुर्गा' का किरदार गढ़ा।
  • कौस्तव ने निर्माताओं से अपील की कि कमाई का एक हिस्सा अर्थपूर्ण और रचनात्मक प्रोजेक्ट्स के लिए जरूर सुरक्षित रखें।

मुंबई, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस): भारतीय सिनेमा में कलात्मक और व्यावसायिक फिल्मों के बीच संतुलन को लेकर निर्देशक और पटकथा लेखक कौस्तव नारायण निरोगी ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। अभिनेत्री पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' जैसी फिल्मों का अस्तित्व उतना ही जरूरी है जितना 'शोले' जैसी ब्लॉकबस्टर का — चाहे दर्शकों की भीड़ कम ही क्यों न हो।

व्यावसायिक और कलात्मक सिनेमा का सह-अस्तित्व

कौस्तव नारायण ने शनिवार को इंस्टाग्राम स्टोरीज पर पॉडकास्ट की क्लिप साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सिनेमा केवल मुनाफे का माध्यम बन जाए, तो सत्यजीत रे जैसी महान सांस्कृतिक विरासतें हमेशा के लिए खो जाएंगी।

उन्होंने एक मार्मिक उदाहरण देते हुए कहा, "मान लीजिए दो सिनेमाघर अगल-बगल हैं — एक में 'शोले' चल रही है और दूसरे में 'पाथेर पांचाली'। स्वाभाविक रूप से 'शोले' में भीड़ कहीं ज्यादा होगी। लेकिन क्या इसी कारण 'पाथेर पांचाली' जैसी फिल्में बनना बंद हो जानी चाहिए? बिल्कुल नहीं।"

सत्यजीत रे का वो किस्सा जो कहता है सब कुछ

कौस्तव नारायण ने पॉडकास्ट में सत्यजीत रे से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि एक बार जीपीसीपी ने रे से संपर्क किया और कहा, "बस इतनी गुजारिश है कि अपनी अगली फिल्म के क्रेडिट में हमारा नाम लिख दें।" इस पर रे ने बिना एक पल रुके जवाब दिया, "बिल्कुल। मुझे स्क्रिप्ट देखने की भी जरूरत नहीं।"

यह किस्सा इस बात का प्रमाण है कि सत्यजीत रे के नाम और काम पर उद्योग को कितना भरोसा था। उनकी विश्वसनीयता किसी भी व्यावसायिक गणना से परे थी।

निर्माताओं को कौस्तव की अहम सलाह

कौस्तव नारायण ने आज के फिल्म निर्माताओं को सीधे संबोधित करते हुए कहा, "पैसा कमाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी कमाई का कुछ हिस्सा 'अर्थपूर्ण प्रोजेक्ट्स' और नई रचनात्मक सोच के लिए जरूर बचाकर रखना चाहिए।" उन्होंने ऋत्विक घटक का उदाहरण देते हुए कहा कि इन दिग्गजों ने बेहद सीमित बजट में भी अविस्मरणीय सिनेमा रचा।

उनका मानना है कि आज के फिल्ममेकर्स को गलतियों के डर से मुक्त होकर नए प्रयोग करने चाहिए, तभी भारतीय सिनेमा की विविधता और समृद्धि बनी रहेगी।

पाथेर पांचाली की जन्मगाथा: ५०० पन्नों का बलिदान

'पाथेर पांचाली' का निर्माण स्वयं में एक असाधारण कहानी है। लेखक विभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने फिल्म लिखने से पहले एक अलग कहानी तैयार की थी, लेकिन एक दिन टहलते हुए उनकी नजर एक आठ साल की बच्ची पर पड़ी — बिखरे बाल, चेहरे पर निश्छल मुस्कान।

उस एक पल ने सब बदल दिया। विभूतिभूषण तत्काल घर लौटे और अपनी पुरानी स्क्रिप्ट के सैकड़ों पन्ने फाड़ डाले। उस बच्ची को उन्होंने अपनी कहानी का केंद्र बनाया, जो आगे चलकर 'दुर्गा' के रूप में भारतीय सिनेमा के सबसे अमर पात्रों में शुमार हुई।

इस कहानी को सत्यजीत रे ने पर्दे पर उतारा और 'पाथेर पांचाली' ने न केवल देश में बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी।

भारतीय सिनेमा के लिए व्यापक संदेश

यह बहस केवल दो फिल्मों तक सीमित नहीं है। ओटीटी के उभार और बॉक्स ऑफिस पर बढ़ते दबाव के इस दौर में कौस्तव नारायण की यह आवाज़ उन तमाम स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए उम्मीद की किरण है जो सीमित संसाधनों में सार्थक सिनेमा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

आने वाले समय में देखना होगा कि क्या बॉलीवुड और भारतीय फिल्म उद्योग इस संतुलन को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाता है, या व्यावसायिक सफलता की दौड़ में कलात्मक सिनेमा हाशिये पर चला जाता है।

Point of View

बल्कि भारतीय सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था पर एक गहरा सवाल है। ओटीटी और मल्टीप्लेक्स के इस युग में जहाँ हर फिल्म को पहले वीकेंड के कलेक्शन से नापा जाता है, वहाँ सत्यजीत रे या ऋत्विक घटक जैसा सिनेमा आज शायद बन ही न पाता। विडंबना यह है कि जिस भारतीय सिनेमा को 'पाथेर पांचाली' ने वैश्विक मंच दिलाया, वही उद्योग आज उस विरासत को बनाए रखने के लिए कोई ढाँचागत प्रतिबद्धता नहीं दिखाता। सरकारी फिल्म वित्तपोषण संस्थाओं की घटती भूमिका और कॉर्पोरेट निर्माताओं की ROI-केंद्रित सोच मिलकर उस रचनात्मक स्थान को संकुचित कर रही हैं जहाँ से असली कला जन्म लेती है।
NationPress
27/04/2026

Frequently Asked Questions

कौस्तव नारायण ने पाथेर पांचाली और शोले की तुलना क्यों की?
कौस्तव नारायण ने यह तुलना यह समझाने के लिए की कि व्यावसायिक सफलता और कलात्मक उत्कृष्टता दोनों का सिनेमा में बराबर महत्व है। उनका मानना है कि भीड़ कम होने से किसी फिल्म की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।
सत्यजीत रे और जीपीसीपी वाला किस्सा क्या है?
कौस्तव नारायण के अनुसार, जीपीसीपी ने सत्यजीत रे से केवल यह अनुरोध किया था कि अगली फिल्म के क्रेडिट में उनका नाम शामिल करें। रे ने बिना स्क्रिप्ट देखे तुरंत हाँ कह दी, जो उनकी विश्वसनीयता और कद को दर्शाता है।
पाथेर पांचाली की कहानी कैसे लिखी गई थी?
लेखक विभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने टहलते हुए एक आठ साल की बच्ची को देखा और प्रेरित होकर अपनी पुरानी स्क्रिप्ट के सैकड़ों पन्ने फाड़ दिए। उस बच्ची पर आधारित किरदार 'दुर्गा' आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे यादगार पात्र बनी।
कौस्तव नारायण ने आज के फिल्म निर्माताओं को क्या सलाह दी?
उन्होंने कहा कि निर्माताओं को अपनी कमाई का एक हिस्सा सार्थक और रचनात्मक प्रोजेक्ट्स के लिए अलग रखना चाहिए। साथ ही फिल्मकारों को गलतियों से डरे बिना नए प्रयोग करने चाहिए।
सत्यजीत रे का भारतीय सिनेमा में क्या योगदान है?
सत्यजीत रे ने 'पाथेर पांचाली' जैसी फिल्मों के जरिए भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनकी फिल्मों ने सिनेमा की परिभाषा बदली और भारत को वैश्विक फिल्म जगत में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया।
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