निरूपा रॉय: शादी से पहले नहीं देखी एक भी फिल्म, फिर 'दीवार' से बनीं अमिताभ बच्चन की अमर 'माँ'
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा में माँ के किरदार का जिक्र होते ही निरूपा रॉय का नाम सबसे पहले ज़ेहन में आता है। 1975 की ऐतिहासिक फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की माँ का किरदार निभाकर उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी छाप छोड़ी, जो आज भी अमिट है। विडंबना यह है कि जिस अभिनेत्री ने पर्दे पर माँ के सबसे मर्मस्पर्शी किरदार जिए, उन्होंने अपनी शादी से पहले एक भी फिल्म नहीं देखी थी।
शुरुआती जीवन और सिनेमा से दूरी
निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड में हुआ था। उनका असली नाम कोकिला किशोरचंद्र बलसारा था। उनके परिवार का फिल्मों से कोई नाता नहीं था — उनके माता-पिता सिनेमा को उचित नहीं मानते थे। 1983 में 'फिल्मफेयर' को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि विवाह से पूर्व उन्होंने कभी कोई फिल्म नहीं देखी थी। ऐसे परिवेश में पली-बढ़ीं निरूपा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वह खुद रुपहले पर्दे का हिस्सा बन जाएंगी।
संयोग से मिली फिल्मी दुनिया में एंट्री
कम उम्र में ही निरूपा का विवाह कमल रॉय से हो गया, और वह मुंबई (तत्कालीन बंबई) आ गईं। उनके पति फिल्मों में अभिनय करना चाहते थे। इसी दौरान एक गुजराती अखबार में कलाकारों की आवश्यकता का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। दोनों ने अपनी किस्मत आजमाने का निर्णय लिया — लेकिन दिलचस्प यह रहा कि फिल्म में अवसर पति को नहीं, बल्कि निरूपा को मिला। इस तरह एक ऐसी अभिनेत्री का सफर शुरू हुआ जिसने हिंदी सिनेमा को उसका सबसे यादगार 'मातृत्व' दिया। 1946 में वह गुजराती फिल्म 'राणकदेवी' में नजर आईं और उसी साल हिंदी फिल्म 'अमर राज' में भी काम किया।
देवी के रूप में अलौकिक पहचान
1950 में फिल्म 'हर हर महादेव' में माता पार्वती का किरदार निभाकर निरूपा रॉय की पहचान एक नई ऊँचाई पर पहुँची। इस फिल्म में त्रिलोक कपूर ने भगवान शिव की भूमिका निभाई थी। उनका अभिनय इतना प्रभावशाली था कि दर्शक उन्हें सचमुच देवी मानने लगे — कथित तौर पर लोग उनके घर तक आशीर्वाद लेने पहुँचते थे। इसके बाद उन्होंने अनेक धार्मिक फिल्मों में देवी के किरदार निभाए और एक विशेष स्थान बनाया।
'दीवार' और 'मेरे पास माँ है' — हिंदी सिनेमा का अमर संवाद
निरूपा रॉय की असली पहचान धार्मिक किरदारों तक सीमित नहीं रही। 1975 में यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म 'दीवार' ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक महान अभिनेत्रियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। इस फिल्म का संवाद 'मेरे पास माँ है' आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित और स्मरणीय संवादों में गिना जाता है। इसके पश्चात उन्होंने 'खून पसीना', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'अमर अकबर एंथनी', 'सुहाग' और 'मर्द' जैसी फिल्मों में भी अमिताभ बच्चन की माँ का किरदार निभाया। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में 'एंग्री यंग मैन' का दौर अपने चरम पर था, और निरूपा रॉय उस क्रोध की जड़ में छिपी माँ की पीड़ा की सजीव मूर्ति बन गई थीं।
विरासत और अंतिम सम्मान
अपने लगभग छह दशक लंबे करियर में निरूपा रॉय ने 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। 2004 में उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया — हिंदी सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान की आधिकारिक स्वीकृति। उसी वर्ष 13 अक्टूबर 2004 को उनका निधन हो गया। एक ऐसी अभिनेत्री की विदाई, जिसने बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के हिंदी सिनेमा की 'माँ' का ताज पहना और उसे अमर कर दिया। उनकी पुण्यतिथि पर आज भी उनके प्रशंसक उन्हें उसी श्रद्धा से याद करते हैं, जिस श्रद्धा से कभी उनके चरित्रों को।