पारितोष त्रिपाठी का पिता को भावुक संदेश: 'आज जो हूं, आपसे हूं' — जुलाई 2017 की वो कॉल जो सब बदल गई
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता पारितोष त्रिपाठी ने अपने दिवंगत पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी की पुण्यतिथि पर सोमवार, 27 जुलाई को इंस्टाग्राम पर एक गहरा भावुक संदेश साझा किया। उन्होंने पिता के निधन को मेले में बिछड़े बच्चे की बेबसी से जोड़ते हुए लिखा कि जुलाई 2017 में आई एक फोन कॉल ने उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल दी।
नौ साल की खामोश तकलीफ
पारितोष ने अपने पिता की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, 'पापा, आपको गए हुए नौ साल बीत गए। साल बीत जाने का कुछ पता नहीं चलता है, वैसे ही अभी भी समझ नहीं आता है कि आप हमारे बीच नहीं हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि हर अच्छे और बुरे मौके पर पिता की कमी महसूस होती है और यह सहना बेहद मुश्किल है।
अभिनेता ने उस कठिन पल को याद किया जब जुलाई 2017 में एक कॉल आई — 'फोन के उस पार की चुप्पी, किसी के बिलखने की आवाज और जब तक आप उस कॉल को समझ पाते हैं, तब तक सब कुछ भूतकाल हो चुका होता है।'
मेले में बिछड़े बच्चे की उपमा
पारितोष ने पिता के न रहने को एक मार्मिक उपमा से व्यक्त किया — 'पिता का ना होना ठीक वैसा ही होता है, जैसे मेले में किसी बच्चे का हाथ छूटना। इस दुनिया के मेले में बच्चा हाथ खोज रहा है। हर साल यादों की भीड़ बढ़ती जाती है और हाथ ओझल हो रहा होता है।'
उन्होंने आगे लिखा कि बाहर से भले ही उनका हाथ मजबूत हो रहा है और उंगलियाँ शब्दों को पिरोना सीख रही हैं, लेकिन 'अंदर से आपका बेटा जोर-जोर से रो रहा है ताकि बच्चे की आवाज मेले को चीर कर पापा तक पहुंच सके।'
बेटी मीशा और पिता की याद
पारितोष ने अपनी बेटी मीशा का जिक्र करते हुए लिखा कि जब वह 'मां, पापा, बाबा, जय जय' बोलती है, तो उन्हें अपने पिता की याद आ जाती है। उन्होंने बताया कि जब मीशा की विद्या आरंभ होगी, तो पहला अक्षर वे खुद लिखकर सिखाएंगे — ठीक वैसे जैसे उनके पिता ने उन्हें सिखाया होगा।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी अंग्रेजी के बड़े विद्वान और संस्कृत के पंडित थे। उनकी इच्छा थी कि काश मीशा को उसके 'बाबा' ही पहला अक्षर सिखाते।
अभिनय और जीवन की यात्रा जारी
पोस्ट के अंत में पारितोष ने लिखा, 'आज जो हूं आपसे हूं… और सब ठीक है, पापा, यात्रा चल रही है, अभिनय यात्रा भी और जीवन यात्रा भी।' यह संदेश पिता के प्रति उनकी कृतज्ञता और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के संकल्प का प्रतीक है।