रब्बी शेरगिल का बयान: 'पिछले 10 साल में राजनीतिक गाने और फिल्में कहाँ गईं?'
सारांश
मुख्य बातें
गायक और गीतकार रब्बी शेरगिल ने एक ताज़ा बातचीत में कहा कि पिछले एक दशक में कला ने मनोरंजन के सामने अपनी जगह काफी हद तक खो दी है — और उनके मुताबिक यह स्थिति आज भी बदली नहीं है। 'बुल्ला की जाना', 'तेरे बिन', 'छल्ला' और 'हीर' जैसे कालजयी गानों से पहचाने जाने वाले रब्बी ने यह टिप्पणी 5 अक्टूबर 2026 को मुंबई में की।
कला और मनोरंजन के बीच बढ़ती खाई
रब्बी शेरगिल के अनुसार, करीब एक दशक पहले भी उन्होंने यह चिंता ज़ाहिर की थी कि कला धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है। अब इतने वर्षों बाद भी उनकी राय नहीं बदली। उन्होंने कहा, ''यह काफी हद तक व्यक्तिगत नज़रिए का विषय है। मेरी राय में आज भी कला के लिए जगह कम हुई है।''
उन्होंने श्रोताओं और दर्शकों से दो सीधे सवाल पूछे — क्या उन्होंने पिछले 10 साल में कोई राजनीतिक गाना सुना है और क्या कोई राजनीतिक फिल्म देखी है? रब्बी का मानना है कि इन सवालों का जवाब खुद दर्शक दे सकते हैं।
कला का असली अर्थ क्या है
रब्बी शेरगिल ने जोर देकर कहा, ''कला का मतलब सिर्फ मनोरंजन करना नहीं है। कला समाज, राजनीति और आसपास की ज़िंदगी पर सवाल उठाने का ज़रिया भी है। मुझे लगता है कि कला कुछ हद तक गायब हो गई है।'' उनके इस बयान को उद्योग की मौजूदा दिशा पर एक तीखी टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि रब्बी शेरगिल का पूरा संगीत-सफर इसी सोच की देन रहा है — उनके गानों में पंजाबी लोक परंपरा, सूफी दर्शन और रॉक की धाराएँ एक साथ बहती हैं, जो शुद्ध व्यावसायिक संगीत से बिल्कुल अलग है।
बुल्ले शाह से रब्बी तक का सफर
रब्बी शेरगिल का सबसे चर्चित गाना 'बुल्ला की जाना' पंजाबी सूफी संत बुल्ले शाह की काफी कविता पर आधारित है। रब्बी ने इस क्लासिक रचना को आधुनिक संगीत के साथ इस तरह पेश किया कि वह एक पीढ़ी की आवाज़ बन गया। यह गाना आज भी उनकी पहचान का सबसे मज़बूत स्तंभ माना जाता है।
बॉलीवुड में भी रब्बी की छाप गहरी रही है। दिवंगत फिल्ममेकर यश चोपड़ा की 2012 में आई फिल्म 'जब तक है जान' में उन्होंने 'छल्ला' गाया, जिसे संगीत में ए. आर. रहमान ने कंपोज़ किया और बोल गुलज़ार ने लिखे थे। फिल्म में शाहरुख खान, कैटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा मुख्य भूमिकाओं में थे।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
संगीत आलोचकों का कहना है कि रब्बी की चिंता बेबुनियाद नहीं है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के उदय के बाद से एल्गोरिदम-संचालित सुझाव उन गानों को आगे बढ़ाते हैं जो ज़्यादा 'स्किप' नहीं किए जाते — और इस दौड़ में सामाजिक-राजनीतिक संदेश वाले गाने अक्सर पीछे रह जाते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब हिंदी फिल्म उद्योग में बड़े-बजट की 'सेफ' फिल्मों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
आगे की राह
रब्बी शेरगिल ने फिलहाल किसी नई परियोजना का ऐलान तो नहीं किया, लेकिन उनका यह बयान कला और व्यावसायिक मनोरंजन के बीच चल रही बहस को फिर से हवा देता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि नई पीढ़ी के कलाकार इस चुनौती को किस तरह स्वीकार करते हैं।