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खय्याम: जब संगीत से पेट नहीं भरा तो थामी सेना की वर्दी, तीन साल बाद लौटकर बनाया सुरों का अमर इतिहास

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खय्याम: जब संगीत से पेट नहीं भरा तो थामी सेना की वर्दी, तीन साल बाद लौटकर बनाया सुरों का अमर इतिहास

सारांश

संगीत से पेट नहीं भरा तो खय्याम ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी की वर्दी पहनी — लेकिन सुर दिल से नहीं गए। तीन साल बाद लौटे और 'उमराव जान' से 'कभी कभी' तक ऐसा संगीत रचा जो दशकों बाद भी गूँजता है। 2011 में पद्म भूषण से सम्मानित इस फनकार की असली विरासत उनकी धुनों में जीती है।

मुख्य बातें

खय्याम का असली नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था; जन्म 18 फरवरी 1927 को पंजाब के राहों में हुआ।
आर्थिक तंगी के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए; लाहौर , रावलपिंडी और पुणे में पोस्टिंग रही।
करीब तीन साल की सेना-सेवा के बाद संगीत की दुनिया में वापसी की और ₹125 प्रति माह वेतन से करियर को नई दिशा मिली।
1948 की फिल्म 'हीर रांझा' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पदार्पण; 'उमराव जान' के संगीत पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
2011 में पद्म भूषण से सम्मानित; 19 अगस्त 2019 को 92 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन।

हिंदी सिनेमा के अप्रतिम संगीतकार मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी — जिन्हें दुनिया सिर्फ खय्याम के नाम से जानती है — की जीवन-यात्रा संघर्ष, धैर्य और संगीत के प्रति अटूट समर्पण की कहानी है। 'कभी कभी', 'उमराव जान', 'नूरी', 'बाजार' और 'त्रिशूल' जैसी फिल्मों के कालजयी गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में बसे हैं। लेकिन इस ऊँचाई तक पहुँचने से पहले एक दौर ऐसा भी आया जब संगीत से आजीविका नहीं चली और उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल होना पड़ा।

बचपन का जुनून और घर से पहला कदम

खय्याम का जन्म 18 फरवरी 1927 को पंजाब के राहों में हुआ था। पढ़ाई-लिखाई से अधिक उनका मन बचपन से संगीत और फिल्मों में रमता था। मशहूर अभिनेता-गायक केएल सहगल उनके आदर्श थे और वह उन्हीं की तरह गायक-अभिनेता बनने का सपना देखते थे। यह जुनून इतना गहरा था कि महज 11 साल की उम्र में वह घर छोड़कर दिल्ली में अपने चाचा के पास चले गए। चाचा ने उनकी रुचि को समझा और पंडित अमरनाथ तथा हुस्नलाल-भगतराम से शास्त्रीय संगीत की तालीम दिलाई।

लाहौर में चिश्ती बाबा की शागिर्दी

आगे चलकर खय्याम लाहौर पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट मशहूर पंजाबी संगीतकार गुलाम अहमद चिश्ती — जिन्हें प्रेम से 'चिश्ती बाबा' कहा जाता था — से हुई। खय्याम उनकी धुनों को इतनी सूक्ष्मता से सुनते थे कि एक बार उन्होंने चिश्ती बाबा की ही वह धुन दोहरा दी जो खुद उस्ताद भूल चुके थे। यह संगीत-बोध देखकर चिश्ती बाबा ने उन्हें अपना सहायक बना लिया। हालाँकि इस काम के बदले नियमित वेतन नहीं मिलता था — बस खाना और रहने की जगह। गायकों-संगीतकारों की रिहर्सल में मदद करते हुए खय्याम ने अपना हुनर तराशा, पर आर्थिक संकट बरकरार रहा।

सेना की वर्दी और तीन साल का अंतराल

बिना कमाई के जीवन-यापन असंभव होता देख खय्याम ने एक कठोर निर्णय लिया — द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। लाहौर, रावलपिंडी और पुणे में उनकी पोस्टिंग रही। वर्दी पहनने के बावजूद संगीत उनके भीतर से नहीं गया — वह साथी जवानों और अधिकारियों के लिए गाते रहे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि खास मौकों पर उनके अधिकारी उन्हें गाने के लिए विशेष रूप से बुलाते थे। करीब तीन साल की सेवा के बाद उन्होंने सेना छोड़ी और एक बार फिर संगीत की राह पकड़ी।

फिल्मी सफर की शुरुआत और पहचान

सेना से लौटकर खय्याम दोबारा चिश्ती बाबा के पास पहुँचे। इस बार फिल्मकार बीआर चोपड़ा ने भी चिश्ती बाबा से सिफारिश की कि खय्याम को उचित मेहनताना मिलना चाहिए। इसके बाद उन्हें ₹125 प्रति माह का वेतन मिलने लगा। मुंबई आकर उन्होंने रहमान वर्मा के साथ 'शर्माजी-वर्माजी' की जोड़ी बनाई और 1948 की फिल्म 'हीर रांझा' से संगीतकार के रूप में पदार्पण किया। रहमान वर्मा के पाकिस्तान चले जाने के बाद खय्याम ने एकल यात्रा शुरू की। फिल्म 'बीवी' का गीत 'अकेले में वो घबराते तो होंगे' और 1953 की फिल्म 'फुटपाथ' का 'शाम-ए-गम की कसम' ने उन्हें पहली बड़ी पहचान दिलाई।

राष्ट्रीय पुरस्कार से पद्म भूषण तक

इसके बाद खय्याम ने 'फिर सुबह होगी', 'कभी कभी', 'नूरी', 'त्रिशूल', 'थोड़ी सी बेवफाई', 'उमराव जान', 'रजिया सुल्तान' और 'बाजार' जैसी फिल्मों में अविस्मरणीय संगीत रचा। 'उमराव जान' के संगीत ने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और अनेक अन्य सम्मान प्राप्त हुए। 2011 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया। 19 अगस्त 2019 को मुंबई में 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ — पर उनकी धुनें आज भी उतनी ही जीवंत हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे एक समय सेना में भर्ती होकर पेट भरना पड़ा। आज जब स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर रेट्रो हिंदी संगीत की माँग तेज़ी से बढ़ रही है, खय्याम जैसे संगीतकारों की विरासत को संस्थागत स्तर पर संरक्षित और दस्तावेज़ीकृत करने की ज़रूरत और भी प्रासंगिक हो जाती है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खय्याम कौन थे और उनका असली नाम क्या था?
खय्याम हिंदी सिनेमा के प्रतिष्ठित संगीतकार थे जिनका पूरा नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था। उनका जन्म 18 फरवरी 1927 को पंजाब के राहों में हुआ और उन्होंने 'उमराव जान', 'कभी कभी' और 'बाजार' जैसी फिल्मों में यादगार संगीत दिया।
खय्याम सेना में क्यों गए थे?
लाहौर में गुलाम अहमद चिश्ती के सहायक के रूप में काम करते हुए खय्याम को नियमित वेतन नहीं मिलता था। आर्थिक मजबूरी के चलते द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश इंडियन आर्मी जॉइन की और लाहौर, रावलपिंडी तथा पुणे में करीब तीन साल सेवा की।
खय्याम को कौन-कौन से बड़े पुरस्कार मिले?
'उमराव जान' के संगीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजा गया।
खय्याम ने फिल्मी करियर की शुरुआत कैसे की?
मुंबई आकर खय्याम ने रहमान वर्मा के साथ 'शर्माजी-वर्माजी' की जोड़ी बनाई और 1948 की फिल्म 'हीर रांझा' से संगीत निर्देशन शुरू किया। रहमान वर्मा के पाकिस्तान जाने के बाद उन्होंने एकल करियर जारी रखा और 1953 की फिल्म 'फुटपाथ' के गीत 'शाम-ए-गम की कसम' से व्यापक पहचान मिली।
खय्याम का निधन कब और कहाँ हुआ?
खय्याम का निधन 19 अगस्त 2019 को मुंबई में 92 वर्ष की आयु में हुआ। वह हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा संगीतकारों में थे जिन्होंने गीतों में कविता और गहरी भावनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
राष्ट्र प्रेस
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